Monday, 12 October 2015

बांटो और राज करो : दादरी हत्याकांड


-    वीणा भाटिया  

 

बीसवीं सदी हत्या से होकर गुजर रही है
अपने अंत की ओर
इक्कीसवीं सदी की सुबह
क्या होगा अखबार पर
खून के धब्बे या कबूतर?




गोरख पांडेय की कविता यकायक याद आना स्वाभाविक है। उत्तर प्रदेश के दादरी में गोमांस रखने और खाने की अफवाह के बाद अखलाक नाम के एक व्यक्ति को पीट-पीट कर मार दिया जाना एक ऐसी घटना है जिसने मध्ययुगीन बर्बरता की याद दिला दी है। यह ऐसी दिल दहला देने वाली घटना है, जिसने पूरे देश के संवेदनशील लोगों को हिला कर रख दिया है। इसका पूरे देश में व्यापक विरोध हो रहा है। पिछले कई दिनों से सोशल मीडिया पर इस घटना के विरोध में लगातार प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। इस घटना के बाद देश के अल्पसंख्यक समुदाय में असुरक्षा की भावना पैदा हो गई है।



नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े संगठनों के लोग, साध्वियां और संत-महंत समय-समय पर जैसे बयान देते रहे हैं, उससे देश के सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने को धक्का पहुंचता जा रहा है। सामाजिक सौहार्द ख़तरे में पड़ा दिखाई दे रहा है और समुदायों के बीच परस्पर विश्वास और भरोसा टूटने लगा है। यह स्थिति देश के जनतांत्रिक ढांचे के लिए सही नहीं कही जा सकती।


अखलाक की हत्या एक सुनियोजित साजिश का परिणाम थी, यह इससे साबित होता है कि पहले दादरी के बिसहाड़ा गांव के मंदिर में माइक से घोषणा करवाई गई कि अखलाक ने गोकशी की है और उसके यहां गोमांस है। इसके बाद सैकड़ों की भीड़ ने उसके घर पर हमला बोल दिया और ईंट-पत्थर मार-मार कर अखलाक की हत्या कर दी। इस हमले में उनका बेटा भी बुरी तरह घायल हुआ। यह घटना 28 सितंबर को हुई। बिसहाड़ा गांव के लोगों का कहना है कि यहां हिंदू-मुसलमानों के बीच कभी भी विवाद नहीं हुआ। दोनों समुदाय के लोग सद्भाव के साथ रहते रहे। एक-दूसरे का सहयोग करते रहे। दुख-सुख में सहभागी बनते रहे। ग्रामीणों का कहना है कि जब गांव की मस्जिद टूटी तो उसे बनवाने में हिंदुओं ने भी सहयोग किया। मृतक अखलाक के सभी लोगों से अच्छे संबंध थे, फिर सवाल उठता है कि ईंट-पत्थरों से मारकर हत्या करने वाले वे लोग कौन थे जो सैकड़ों की तादाद में वहां जुट गए थे। 


मंदिर के जिस पुजारी ने अखलाक के घर गोमांस रखे होने की घोषणा की थी, उसने यह स्वीकार किया कि उसे इसके बारे में कुछ पता नहीं था और उससे जबरदस्ती यह घोषणा करवाई गई। सुखीराम नाम का यह पुजारी अब लापता है। गोमांस रखने और खाने की अफ़वाह उड़ा भीड़ को उकसा कर ऐसा हमला करवाना सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने की सोची-समझी साजिश ही कही जा सकती है। भाजपा के नेता इसके लिए उत्तर प्रदेश की समाजवादी सरकार को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं। अखिलेश सरकार ने मृतक अखलाक के परिवार के लिए 20 लाख रुपए के मुआवज़े की घोषणा की। यह ठीक है कि किसी की मौत की भरपाई कितनी भी बड़ी रकम के मुआवज़े से नहीं की जा सकती, लेकिन इस पर भी भाजपा के नेताओं ने आपत्ति जताई।  भाजपा विधायक संगीत सोम ने तो यहां तक कहा कि मुस्लिम मरेगा तो 20 लाख दिए जाएंगे और हिंदू मरेगा तो 20 हजार भी नहीं दिए जाएंगे।


इससे समझा जा सकता है कि ऐसे नेताओं की नीयत क्या है और वास्तव में वे चाहते क्या हैं। यह ठीक है कि यूपी की अखिलेश सरकार दंगों की रोकथाम कर पाने में सफल नहीं रही, पर केंद्र में मोदी सरकार के आने के पहले मुजफ्फरनगर में जो भयानक दंगे हुए, उनके पीछे किसकी भूमिका थी। आज भी गोमांस खाने की अफवाह उड़ाकर जिस तरह एक निर्दोष व्यक्ति की नृशंस हत्या की गई, उसके पीछे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण ही एकमात्र उद्देश्य समझ में आता है। कहा जा रहा है कि उस इलाके में पिछले दो-तीन महीने से कुछ नामालूम-से संगठनों की गतिविधियां चल रही थीं। पीड़ित परिवार का कहना है कि कई बार उन्हें धमकी दी गई थी। यह भी सुनने में आया कि कुछ लोग कह रहे थे कि इसे दूसरा मुजफ्फरनगर बना दिया जाएगा। 


राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की घटनाओं से भाजपा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है, ताकि चुनावों में उसे जीत हासिल हो सके। जहां तक गोकशी और गोमांस खाने का सवाल है, यह भूलना नहीं होगा कि भारत बड़े पैमाने पर गोमांस का निर्यात करता है। 



जहां तक इतिहास का सवाल है, भारत में मुगल शासन की स्थापना करने वाले बाबर ने लिखा था कि यहां के लोग गाय को पवित्र मानते हैं, इसलिए उसका वध नहीं किया जाना चाहिए। यही बात महान मुगल शासक अकबर ने भी कही थी। पर बाबर के नाम पर बनी मस्जिद का विध्वंस कर और बड़े पैमाने पर दंगे भड़काकर सत्ता में आने वाली भाजपा और उसके पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता यह क्यों समझना चाहेंगे। उनका विश्वास समुदायों के बीच घृणा को बढ़ावा देने में है, ताकि अंग्रेजों की कुख्यात नीति ‘बांटो और राज करो’ को अमली जामा पहनाया जा सके।