Monday, 28 September 2015

वीणा भाटिया की कविता : सफर में

साहि‍त्‍य

वीणा भाटिया की कविता : सफर में

By haribhoomi.com | Sep 27, 2015 |


image: http://www.haribhoomi.com/haribhoomi_cms/gall_content/2015/9/2015_9$largeimg227_Sep_2015_094545573.jpg
title=



ढेरों हैं खुशियां छिपीं
नहीं है अकेलापन
ना है उदासी
‘साए में धूप’ देगी ताजगी
 
बच्चों-सा चंचल है गर बनना
‘तोतोचान’ पढ़ ही लेना
 
सरकारी तंत्र को है जानना
‘राग दरबारी’ जरूर पढ़ना
देखोगे जीवन झुग्गी-झोपड़ी का
‘मुर्दाघर’ साथ ही रखना
 
हैरान हो जाओगे
जब जानोगे
‘आवारा मसीहा’ जीवनी थी
शरतचंद्र चटर्जी की
अमृता प्रीतम संपादक थीं
‘नागमणि’ की
वारिस शाह को झकझोरा था
अमृता प्रीतम ने ही
‘रसीदी टिकट’ थी उनकी ही जीवनी
तुम नहीं
ख़ुद को पढ़वा ले जाएगी पुस्तक
गोरख पांडेय ने ही लगाई थी गुहार
‘जागते रहो सोने वालो’ की
 
ऐसे क्षण जब लगें उबने
चिंताओं से जाएं घिर
या करना है लंबा सफर
साथ रखें पुस्तक
पुस्तकों से बड़ा नहीं कोई मित्र
मित्र की नहीं लगेगी टिकट
 
‘मां’, ‘सारा आकाश’, ‘गोरा’, ‘कितने पाकिस्तान’,
‘घुमक्कड़ शास्त्र’ पढ़कर जानो
घूमने से  क्या मिलता ज्ञान
 
‘वे दिन’, ‘कबिरा खड़ा बजार में’,  
‘माटी कहे कुम्हार से’,
‘एक गधे की आत्मकथा’,
‘फेसबुक में फंसे चेहरे’, ‘लेकिन दरवाज़ा’,
‘गोदान’, पाश ‘बीच का रास्ता नहीं होता’
हंस पत्रिका, ‘गुनाहों का देवता’
साहित्य में है रुचि बढ़ाता
 
पढ़ते-पढ़ते ही
लो आ गया ठिकाना
रखें स्नेह से सहेज कर
यही तो है हमारी धरोहर।
 

Read more at http://www.haribhoomi.com/literature/poem-by-vina-bhatiya/31397.html#Xvo8KXImDAGYT8qr.99