Tuesday, 21 July 2015

कुमार पाशी की नज़्म - सौगंधी

दुनिया में वेश्यावृत्ति को सबसे पुराना धंधा माना गया है। सभ्यता के विकास के साथ यह घृणित धंधा बढ़ता ही चला गया। वेश्याओं के दुखी और विडंबनापूर्ण जीवन पर विश्व साहित्य में एक से एक कृतियां सामने आई हैं। उर्दू के मशहूर अफ़सानानिगार मंटो ने कई कहानियां इनके जीवन पर लिखी हैं। उनकी एक कहानी है - हतक। जब यह कहानी छपी तो इसने सामान्य पाठकों से लेकर मशहूर शाइरों-अदीबों के दिलों को झकझोर डाला। इस कहानी के किरदार सौगंधी पर कई शाइरों ने नज़्में लिखीं। पेश है कुमार पाशी की नज्म।




इक मौसम मेरे दिल के अंदर
इक मौसम मेरे बाहर
इक रस्ता मेरे पीछे भागे
इक रस्ता मेरे आगे
बीच में चुपचाप खड़ी हूं, जैसे
बूझी हुई बुझारत
किसको दोष दूं : जाने मुझको
किसने किया अकारत

आईना देखूं, बाल सवारूं, लब पर हंसी सजाऊं
गला सड़ा वही गोश्त कि जिस पर
सादे रंग चढ़ाऊं
जाने कितनी बर्फ़ पिघल गई - बह गया कितना पानी
किस दरिया में ढूंढू बचपन
किस दरिया में जवानी

रात आए : मेरी हड्डियां जागें
दिन जागे : मैं सोऊं
अपने उजाड़ बदन से लग कर
कभी हंसूं, कभी रोऊं
एक भयानक सपना : आग में लिपटी जलती जाऊं
चोली में उड़से सिक्कों के संग पिघलती जाऊं


इक मौसम मेरे दिल के अंदर
इक मौसम मेरे बाहर
इक रस्ता मेरे पीछे भागे
इक रस्ता मेरे आगे
रस्ते बीच मैं खड़ी अकेली
पिया न संग सहेली
क्या जाने मुझ जनमजली ने क्या अपराध किया है
आखिर क्यों दुनिया का मैंने सारा ज़हर पिया है
मेरे साथ ज़माने
तूने अच्छा नहीं किया है

दूर खड़े मेरे आंगन द्वारे
पल पल पास बुलाएं
कहो हवाओं से अब - उनको दूर
बहुत ही दूर कहीं ले जाएं
झूट की यह तारों दीवारें
झूट की यह फ़र्श और छत है
झूट का बिस्तर, झूट के साथी
झूट की हर संगत है
झूट बिछाऊं, झूट लपेटूं
झूट उतारूं, पहनूं
झूट पहन कर जिस्म के वीराने में दौड़ती जाऊं
क्यों नहीं ज़हन की दीवारों से टकराऊं, मर जाऊं

शमा सरीखी पिघल रही हूं
ओझल कभी उजागर
इक मंज़र मेरे दिल के अंदर
इक मंज़र मेरे बाहर
मुझको ढूंढने कौन आए अब इन तनहा राहों पर
बोटी-बोटी कट गई मेरी रौशन चौराहों पर

अब गहरे सन्नाटे में किसको आवाज़ लगाऊं
कौन आएगा मदद को मेरी
क्या चीखूं, चिल्लाऊं
अपने गोश्त की मैली चादर
ओढ़ के चुप सो जाऊं
और अचानक नींदों के दलदल में गुम हो जाऊं
खुद को खुद में ढूंढने निकलूं
लेकिन कहीं न पाऊं...