Monday, 22 May 2017

'दुनिया इन दिनों' के कोलकाता विशेषांक में प्रकाशित... स्मृति में एक हज़ार चौरासवें की माँ - वीणा भाटिया



महाश्वेता देवी का जीवन और लेखन एक जलती मशाल की तरह है। महाश्वेता देवी सिर्फ़ एक रचनाकार ही नहीं, बल्कि सामाजिक कार्यकर्ता भी रही हैं। शोषितों-उत्पीड़ितों और वंचित तबकों के साथ संघर्ष के मोर्चे पर उनके साथ आवाज उठाने वाले ऐसे साहित्यकार कम ही हुए हैं। महाश्वेता देवी ने रवीन्द्रनाथ से लेकर प्रेमचंद की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए समकालीन युवा साहित्यकारों से भी लगातार संवाद बनाए रखा और उनकी रचनाशीलता को धार देने में भूमिका निभाई। अपनी कृतियों में महाश्वेता देवी ने आधुनिक भारत के उस इतिहास को जीवंत किया है, जिसकी तरफ कम साहित्यकारों का ध्यान गया। वह है देश का आदिवासी समाज। आदिवासी समाज के ऐतिहासिक संघर्षों की गाथा लिखने के लिए महाश्वेता देवी ने उनके बीच अपना काफी समय बिताया। महाश्वेता देवी मानती हैं कि धधकते वर्ग-संघर्ष को अनदेखा करने और इतिहास के इस संधिकाल में शोषितों का पक्ष न लेनेवाले लेखकों को इतिहास माफ नहीं करेगा। असंवेदनशील व्यवस्था के विरुद्ध आक्रोश और एक समतावादी शोषणविहीन समाज का निर्माण ही उनके लेखन की प्रेरणा रही।
अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘अरण्येर अधिकार’ जो हिंदी में ‘जंगल के दावेदार’ के नाम से प्रकाशित हुआ है, लिखने के लिए महाश्वेता देवी ने काफी लंबा समय रांची और उसके आसपास के इलाके में बिताया। तथ्य संग्रह करने के साथ ही उन्होंने वहां के आदिवासियों के जीवन को नजदीक से देखा और उनके संघर्षों से जुड़ गईं। उन्होंने साहित्य के माध्यम से जन-इतिहास को सामने लाने का वह काम किया जो उनके पहले नहीं हुआ था। ‘जंगल के दावेदार’ उनकी ऐसी कृति है, जिसे 1979 में जब साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला तो आदिवासियों में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई थी। जगह-जगह ढाक बजा कर आदिवासियों ने कहा था कि उन्हें ही साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला है। किसी लेखक से लोगों का ऐसा जुड़ाव दुर्लभ है। ‘पथ के दावेदार’ के बारे आलोचक कृपाशंकर चौबे ने लिखा है, “यह उपन्यास आदिवासियों के सशक्त विद्रोह की महागाथा है जो मानवीय मूल्यों से सराबोर है। महाश्वेता ने मुख्य मुद्दे पर उंगली रखी है। मसलन बिरसा का विद्रोह सिर्फ अंग्रेजी शासन के विरुद्ध नहीं था, अपितु समकालीन सामंती व्यवस्था के विरुद्ध भी था। बिरसा मुंडा के इन पक्षों को सहेज कर साहित्य और इतिहास में प्रकाशित करने का श्रेय महाश्वेता को ही है।” महाश्वेता देवी सिर्फ आदिवासियों के विद्रोह पर ही लिख कर नहीं बैठ गईं, बल्कि उनके जीवन के सुख-दुख में शामिल हुईं। उनके हक-हकूक के लिए उनके साथ खड़े हो कर उन्होंने आवाज बुलंद की। यही बात उन्हें दूसरे लेखकों से अलग और विशिष्ट बनाती है।
महाश्वेता देवी का जन्म 14 जनवरी, 1926 को ढाका में हुआ था। साहित्यिक संस्कार बचपन से उन्हें मिले। 12 वर्ष की उम्र में ही वे बांग्ला के श्रेष्ठ साहित्य से परिचित हो चुकी थीं। अपनी दादी की लाइब्रेरी से किताबें लेकर पढ़ने का जो चस्का उन्हें बचपन में लग गया था। उनकी मां भी उन्हें साहित्य और इतिहास की चुनिंदा किताबें पढ़ने को देती थीं। बचपन में ही जब वे शान्तिनिकेतन शिक्षा प्राप्त करने के लिए गईं तो उन्हें रवीन्द्रनाथ टैगोर के साक्षात्कार का मौका मिला। सातवीं कक्षा में गुरुदेव ने उन्हें बांग्ला में एक पाठ पढ़ाया। 1936 में शान्तिनिकेतन में बंकिम शतवार्षिकी समारोह में उन्हें रवीन्द्रनाथ का व्याख्यान सुनने का मौका मिला। उस समय आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी वहां हिन्दी पढ़ाते थे। ऐसे माहौल में महाश्वेता देवी के साहित्यिक संस्कार विकसित होते गए। बाद में पारिवारिक कारणों से शान्तिनिकेतन उन्हें छोड़ना पड़ा और वे कलकत्ता चली गईं। वहां उन्होंने ‘छन्नहाड़ा’ नाम से एक हस्तलिखित पत्रिका निकाली।
महाश्वेता देवी के पिता मनीष घटक भी साहित्यकार थे। उनकी माँ धारित्री देवी भी लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता थीं। चाचा ऋत्विक घटक महान फिल्मकार हुए। कहने का मतलब पूरा परिवार ही साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ा हुआ था। ऐसी पारिवारिक पृष्ठभूमि में महाश्वेता देवी ने बहुत कम उम्र में ही लिखना शुरू कर दिया था। उनका पहला उपन्यास ‘झांसी की रानी’ 1956 में प्रकाशित हुआ। इसे लिखने के लिए महाश्वेता देवी ने झांसी और 1857 की जनक्रान्ति से जुड़े इलाकों की यात्रा की और गहन शोध किया। उन्होंने झांसी. जबलपुर, ग्वालियर, कालपी, पूना, ललितपुर की यात्रा की और तमाम दस्तावेजों की छानबीन कर, पुराने लोगों की यादों को जुटा कर उपन्यास लिखा। इसे 1857 की जनक्रान्ति का साहित्यिक दस्तावेज कहा जा सकता है। कोई रचना लिखने के लिए संबंधित इलाके की यात्रा करना, तथ्य जुटाना और वहां के लोगों से जीवंत संपर्क कायम करना महाश्वेता देवी की अपनी विशेषता रही है। यही कारण है कि इनके उपन्यास इतिहास की थाती बन चुके हैं और उनसे आने वाली पीढ़ियों को अपने इतिहास को समझने में मदद मिलेगी।
महाश्वेता देवी ने लेखन की शुरुआत कविता से की थी, पर बाद में कहानी और उपन्यास लिखने लगीं। ‘अग्निगर्भ’, ‘जंगल के दावेदार’, ‘1084 की मां’, ‘माहेश्वर’, ‘ग्राम बांग्ला’ सहित उनके 100 उपन्यास प्रकाशित हैं। बिहार के भोजपुर के नक्सल आन्दोलन से जुड़े एक क्रान्तिकारी के जीवन की सच्ची कथा उपन्यास के रूप में उन्होंने ‘मास्टर साहब’ में लिखी। इसे उनकी बहुत ही महत्त्वपूर्ण कृति माना गया। महाश्वेता देवी वामपंथी विचारधारा से जुड़ी रहीं, पर पार्टीगत बंधनों से अलग ही रहीं। महाश्वेता देवी ने हमेशा वास्तविक नायकों को अपने लेखन का आधार बनाया। ‘झांसी की रानी’ से लेकर ‘जंगल के दावेदार’ में बिरसा मुंडा और भोजपुर के नक्सली नायक पर आधारित उपन्यास ‘मास्टर साहब’ में इसे देखा जा सकता है। ‘1084 की मां’ उनका बहुत ही महत्त्वपूर्ण उपन्यास है, जिस पर फिल्म भी बनी। यह दरअसल, संघर्ष और विद्रोह की वह कहानी है जिसे इतिहास-लेखन में भी स्थान नहीं मिला। कहा जा सकता है कि महाश्वेता देवी का समग्र लेखन उत्पीड़ित-वंचित तबकों के संघर्षों को सामने लाने वाला है, उसमें वह इतिहास-बोध है जो संघर्षों की दिशा को तय करने वाला है। महाश्वेता देवी के लिए उनका लेखन कर्म जीवन से पूरी तरह आबद्ध है। यही कारण है कि वे लेखन के साथ ही सामाजिक आन्दोलनों में एक कार्यकर्ता की तरह शामिल होती रहीं। कार्यकर्ता-लेखक का एक नया ही रूप महाश्वेता देवी में दिखता है, जो आज के समय में दुर्लभ ही है।
महाश्वेता देवी ने शान्तिनिकेतन से बीए करने के बाद कलकत्ता विश्वविद्यालय से एमए की डिग्री ली और अंग्रेजी की व्याख्याता के रूप में काम किया। साथ ही, लगातार यात्रा करते हुए उन्होंने घुमंतू पत्रकार की भूमिका भी निभाई और बांग्ला अखबारों-पत्रिकाओं के लिए रिपोर्टिंग करती रहीं। महाश्वेता देवी के काम का क्षेत्र बहुत व्यापक रहा है। उन्हें 1996 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। पर ऐसी लेखिका के लिए पुरस्कार कोई मायने नहीं रखते। दरअसल, महाश्वेता देवी ज़मीनी लेखिका रही हैं, जो हमेशा किसी भी तरह के प्रचार और चकाचौंध से दूर लेखन और आन्दोलनात्मक गतिविधियों से ही जुड़ी रहीं।

फिल्म रिव्यू : शबाना नहीं तापसी पन्नू है - वीणा भाटिया


बॉलीवुड में फिल्मों का सीक्वल बनाने का ट्रेन्ड रहा है, पर ‘नाम शबाना’ को अक्षय कुमार की फिल्म ‘बेबी’ का प्रीक्वल कहा जा रहा है, यानी इस फिल्म की कहानी ‘बेबी’ के पहले की है।

अपनी तरह की एक अलग ही फिल्म है‘नाम शबाना’ ।

यह पूरी तरह से तापसी पन्नू की फिल्म है। ‘बेबी’ में तापसी पन्नू का किरदार कलाइमैक्स के अंतिम 20 मिनट के दृश्यों में था, पर इस फिल्म में अक्षय कुमार का किरदार ही 20 मिनटों में मानो सिमट कर रह गया है।

ऐसा लगता है कि पुरुष केन्द्रित समाज और सिनेमा में अब कुछ महिलाएँ सेंध मार रही हैं और सेंध मारने के नियम को भी तोड़ रही हैं। सेंध मारने के प्रशिक्षण के समय सिखाया जाता था कि सेंध मारकर पहले पैर भीतर डालना चाहिए, क्योंकि सिर डालने पर घर का कोई जागा हुआ सदस्य बाल पकड़कर भीतर खींच सकता है और पकड़े जा सकते हैं।

वीणा भाटियामनोज बसु के उपन्यास ‘रात के मेहमान’ में सेंध मारने की विधा पर यथेष्ट प्रकाश डाला गया है, परन्तु उस क़िताब में यह नहीं लिखा है कि अगर व्यवस्था ही सेंध मारे तो क्या करना है? वह हमारे ‘अच्छे दिनों’ की किताब है।

तापसी पन्नू, कंगना रनोट, स्वरा भास्कर जैसी अभिनेत्रियों को दीपिका पादुकोण या प्रियंका चोपड़ा की तरह करोड़ों रुपए का मेहनताना नहीं मिलता, परन्तु इनकी प्रतिभा से सिनेमा का परदा खूब रौशन हो रहा है।

ढाई घंटे की इस फिल्म में जो बीस मिनट तापसी पन्नू परदे पर नहीं होती हैं, वे काटे नहीं कटते। उनके चुम्बकीय व्यक्तित्व का लाभ भव्य बजट की फिल्म बनाने वाले संभवतः इसलिए नहीं लेते कि वे अपने अभिनय से नायक को बौना साबित कर सकती हैं।

पटकथा लेखक व फिल्मकार ने हमें ‘वेडनसडे’ में आश्चर्यचकित किया था और ‘बुधवार’ से शुरू होकर वे ‘इतवार’ तक पहुँच गए हैं।

थ्रिलर विधा दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान पेरिस में प्रारंभ हुई, जब नाज़ी कब्ज़े में रहते हुए फ्रांस में देशप्रेम व मानवीय मूल्यों वाली फिल्में थ्रिलर की तरह बनाई जाती थीं। थ्रिलर विधा में हर किस्म के दर्शक की रुचि होती है। उनका सनसनीखेज स्वरूप दर्शकों को बांधे रखता है।

इस फिल्म की बुनावट और कसावट कुछ ऐसी है कि इसमें मध्यान्तर का व्यवधान खल जाता है। कोई अनावश्यक दृश्य नहीं है और संवाद इतने प्रभावोत्पादक हैं कि तालियां बजाने से आप स्वयं को रोक नहीं पाते। मसलन एक प्रशिक्षक कहता है कि मरने के लिए तैयार हो तो शागिर्द व्यंग्य से कहती हैं,

“सर, आप इतने मोटिवेशनल कैसे हैं।”

सभी देशों के अपने गुप्तचर विभाग होते हैं। देश के भीतर गुप्तचरी करने से अधिक जोखिम का काम शत्रु देश में या उसके खिलाफ किसी अन्य देश में काम करना है। सलमान खान अभिनीत ‘टाइगर’ में जो काम पुरुष करते हैं, वही काम इस फिल्म में एक औरत करती है। दूसरे विश्वयुद्ध के समय माताहारी नामक एक विख्यात महिला गुप्तचरी के शिखर पर पहुंची थी। 

इस फिल्म की नायिका ने अपने बचपन में अपने शराबी पिता को मार दिया था, क्योंकि वह उसकी मां को बिना किसी वजह के रोज मारता था। इसका प्रभाव उसके पूरे जीवन पर पड़ता है और वह अपने प्रेमी की सहायता से उस प्रभाव से मुक्त होने का प्रयास करती है तो कुछ मदांध राजनेता के सुपुत्र उसके प्रेमी को मार देते हैं। ये त्रासद घटनाएं उसके दिल में पिघला इस्पात भर देती हैं और वह चलता-फिरता बम बन जाती है।

तापसी पन्नू ने अपने अभिनय से उन क्षणों को जीवंत कर दिया है, जब टास्क फोर्स चीफ रणबीर (मनोज बाजपेयी) की मदद से शबाना अपने प्रेमी के कातिल को उसके अंजाम तक पहुंचाती है।

शबाना टास्क फोर्स का हिस्सा बन जाती है। उसे एक खास मिशन के लिए ट्रेन्ड करने के बाद मलेशिया भेजा जाता है, जहां उसका सामना दुनिया के कई आतंकी संगठनों को खतरनाक हथियारों की सप्लाई करने वाले टोनी उर्फ मिखाइल (पृथ्वीराज सुकुमारन) से होता है। यहां शबाना की मदद के लिए टास्क फोर्स का जांबाज अफसर अजय (अक्षय कुमार) और शुक्ला जी (अनुपम खेर) भी हैं।

शबाना की चाल से ही उसके चरित्र का यह इस्पात नज़र आता है। फिल्म में उनके लिए पोशाक भी बड़ी सावधानी से चुनी गई है। अब तापसी पन्नू मांडेस्टी ब्लेज़ के पात्र को अभिनीत करने के लिए पूरी तरह तैयार है। उसकी एक झलक ही उसके फौलादी इरादों का परिचय देती है।

इस थ्रिलर में गुप्तचर विभाग के आला अफ़सर को अन्य देश में खतरों से भरा कारनामा करने का आदेश देना है और नियमानुसार उसे उसके लिए अपने मंत्री से आज्ञा लेनी है। वह मंत्री के सचिव को फोन करता है और अपनी आदत के अनुसार वह कहता है कि मंत्री जी व्यस्त है और कोई अत्यंत महत्वपूर्ण बात है तो वह मंत्री जी से संपर्क करा सकता है। वह अफ़सर अपने मंत्री के निकम्मेपन को जानता है और कह देता है कि कोई महत्वपूर्ण बात नहीं है, लेकिन अगले ही क्षण अपने गुप्तचर को आदेश देता है कि दुश्मन देश के गुप्तचर के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। उसने आवश्यक आदेश व अनुमति प्राप्त कर ली है। यह दृश्य हमारे मंत्रियों की जहालत व निकम्मेपन को उजागर करता है। कई बार ऐसा लगता है कि जाहिल मंत्रियों के बिना भी देश का काम चल सकता है और महत्वपूर्ण निर्णय लिए जा सकते हैं।

इस फिल्म के खलनायक का व्यक्तित्व प्रभावशाली है। लेकिन उसका प्रस्तुतिकरण सामान्य मनुष्य की तरह किया गया है और वह प्राण, अमजद खान या अमरीश पुरी से बिल्कुल जुदा सामान्य व्यक्ति लगता है। प्रायः खलनायक के परदे पर आते ही पार्श्व संगीत उसकी मौजूदगी को रेखांकित करता है। यह फिल्म बड़े सधे ढंग से बनाई गई है। अक्षय कुमार ने यह जानते हुए यह फिल्म स्वीकार की कि वे फिल्म के आधे से भी कम भाग में परदे पर नज़र आएंगे। यह पूरी तरह से तापसी पन्नू की फिल्म है। निर्देशक शिवम नायर ने तापसी के किरदार पर खूब मेहनत की है। कुल मिला कर कहा जा सकता है कि फिल्म ‘पिंक’ के बाद तापसी पन्नू ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि अपनी बेजोड़ अभिनय प्रतिभा के दम पर वह अकेले  फिल्म को सफलता दिला सकती हैं।

कलाकार : तापसी पन्नू, अक्षय कुमार, मनोज बाजपेयी

निर्देशक : शिवम नायर

अजीत कौर की आत्मकथा 'ख़ानाबदोश' पर लेख - वीणा भाटिया

Sunday, 21 May 2017

फिल्म रिव्यू वसंत विहार की झुग्गी बस्ती : हिन्दी मीडियम वीणा भाटिया

वसंत विहार की झुग्गी बस्ती : हिन्दी मीडियम

वीणा भाटिया

बॉलीवुड में कभी-कभी ही कोई ऐसी फिल्म बनती है जो किसी ज्वलंत समस्या पर विचार करने को मजबूर कर देती है। हिन्दी मीडियम एक ऐसी ही फिल्म है।

साकेत चौधरी निर्देशित यह फिल्म भारतीय मध्य वर्ग के जीवन की ऐसी विसंगति को उजागर करती है, जिस पर शायद ही किसी का ध्यान गया हो।

दरअसल, आजादी के सात दशक बीत जाने के बाद भी अंग्रेज़ी एक भाषा से ज्यादा स्टेटस सिंबल ही है। इंग्लिश मीडियम स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना हर व्यक्ति की चाहत होती है। इसी को देखते हुए आज बड़े शहर हों या छोटे कस्बे, हर जगह इंग्लिश मीडियम स्कूल खुल गए हैं। दरअसल, यह औपनिवेशिक गुलामी वाली मानसिकता का परिणाम है।

आज अंग्रेजी पढ़ना-लिखना और बोलना ही शिक्षित होने का पर्याय बन गया है। उच्च शिक्षा संस्थानों में अंग्रेजी पूरी तरह हावी है। प्रशासन, न्यायपालिका, संसद हर जगह अंग्रेजी का ही सिक्का चलता है। सामान्य परिवारों के बच्चे प्रतिभाशाली होते हुए भी सिर्फ अंग्रेजी की अच्छी जानकारी नहीं होने के कारण पिछड़ जाते हैं।

उल्लेखनीय है कि महात्मा गांधी ने अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दिए जाने का विरोध किया था, पर आजादी के बाद भी अंग्रेजी का प्रभाव हर क्षेत्र में बना रहा। कहा जा सकता है कि अंग्रेजी के प्रति आकर्षण उस मानसिक गुलामी को दर्शाता है जो दो सौ वर्षों के औपनिवेशिक शासन का परिणाम है। यह एक ऐसी सच्चाई है जिससे आंखें नहीं चुराई जा सकती। इससे कई तरह की विडंबनाएं पैदा हुई हैं, जो कई बार बहुत ही त्रासद तो हास्यास्पद भी हो जाती हैं।

इसी विडंबना को दिखाने की कोशिश ‘हिन्दी मीडियम’ में की गई है।

कहा जा सकता है कि यह अपने तरह की खास ही फिल्म है जो दर्शकों को गुदगुदाने, उनका मनोरंजन करने के साथ ही अपना संदेश देने में पूरी तरह सफल रही है।    

फिल्म की कहानी दिल्ली के चांदनी चौक में रहने वाले कपड़ों के विक्रेता राज बत्रा (इरफान खान) की है जिसने हिन्दी मीडियम से पढ़ाई  की और उसे टूटी-फूटी अंग्रेजी भी आती है। लेकिन उसकी पत्नी मीता (सबा कमर) को अच्छी अंग्रेजी आती है और वह चाहती है कि उसकी बच्ची पिया टॉप के अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाई करे। उसके एडमिशन के लिए राज और मीता बहुत कोशिश करते हैं और एडमिशन से पहले माता-पिता के इंटरव्यू के दौरान उन्हें बहुत परेशानी उठानी पड़ती है। इस सबके बावजूद जब पिया का नाम किसी कॉन्वेंट स्कूल की लिस्ट में नहीं आता तो राज फर्जी डॉक्युमेंट के सहारे बीपीएल कोटे से पिया का एडमिशन कराने की कोशिश शुरू करता है और वसंत विहार जैसे पॉश जगह से एक झुग्गी बस्ती में शिफ्ट हो जाता है। मीता वहां गरीबों की तरह रहती है और राज फैक्ट्री में काम करने के लिए जाने लगता है।

ये सब कुछ केवल इंग्लिश मीडियम में बच्चे की पढ़ाई के लिए। जाहिर है, यह अतिरंजना भी विडंबना को सामने लाने के लिए ही दिखाई गई है।

झुग्गी बस्ती में दीपक डोबरियाल सामने आते हैं। वे भी बीपीएल कोटे से अपने बेटे का एडमिशन उसी स्कूल में कराना चाह रहे हैं जिसमें राज की बेटी ने फॉर्म भर रखा है। फिल्म में फैक्ट्री वर्कर श्याम के तौर पर उनकी भूमिका कमाल की है।

इरफान और दीपक डोबरियाल का अभिनय बहुत ही सधा हुआ है। सहज और स्वाभाविक अभिनय के साथ वे जो हास्य पैदा करते हैं, वह दर्शकों को बांध लेने वाला है।

अभिनय में पाकिस्तानी अभिनेत्री सबा कमर जरा भी उनसे पीछे नहीं हैं। भारतीय परिवेश में अपने किरदार को सबा कमर ने बहुत अच्‍छी तरह निभाया है।

यह फिल्‍म इरफान की अदाकारी, कॉमिक और संवाद अदायगी के लिए यादगार रहेगी। साधारण संवादों में सिर्फ अपने खास अंदाज से वे हास्‍य और व्‍यंग्‍य पैदा करते हैं। उनका हास्य और व्यंग्य बेध कर रख देने वाला है। वे हर उस पिता का प्रतिनिधित्व करते लगते हैं जो अपने बच्चे को अंग्रेजी मीडियम में पढ़ाने का दबाव झेल रहा है।

कहा जा सकता है कि ‘हिन्दी मीडियम' एक ऐसी जरूरी फिल्‍म है, जिसे अवश्य देखा जाना चाहिए। फिल्म में व्यंग्य के छींटे किस कदर पड़ते हैं, उसकी एक बानगी देखें। राज बत्रा कहता है – “इंग्लिश इज इंडिया एंड इंडिया इज इंग्लिश। ह्वेन फ्रांस बंदा, जर्मन बंदा स्‍पीक रौंग इंग्लिश, वी नो प्राब्‍लम। एक इंडियन बंदा से रौंग इंग्लिश, तो बंदा ही बेकार हो जाता है जी।“

कहा जा सकता है कि अंग्रेजी के अनपेक्षित प्रभाव के मुद्दे को उठा कर इस फिल्म ने एक बड़ी ऐतिहासिक-सामाजिक विसंगति को जाहिर तो किया ही है, एक बड़ा सवाल भी दर्शकों के सामने रखा है। जाहिर है, इस सवाल से संवेदनशील दर्शकों को ही जूझना है।

कलाकार : इरफान खान, सबा कमर, स्वाति दास, दिशिता और दीपक डोबरियाल

निर्देशक : साकेत चौधरी
http://www.hastakshep.com/hindinews/hindi-medium-film-review-14182

अरुणा शानबाग की याद में वीणा भाटिया



http://www.hastakshep.com/hindiopinion/aruna-shanbaug-rape-alive-zombies-indian-society-culture-roots-of-rape-1416218 मई, 2015 को 62 साल की अरुणा रामचंद्र शानबाग की 42 वर्षों तक लगातार कोमा में रहने के बाद मृत्यु हो गई थी। वे कोई असाधारण महिला नहीं थीं। पर उनके जीवन और मौत में कुछ तो असाधारणता थी, जिसने संवेदनशील लोगों, बुद्धिजीवियों और महिला अधिकार के लिए लड़ने वाले लोगों के दिलो-दिमाग में एक जुंबिश पैदा की। अरुणा की मौत ने एक बार फिर उन सवालों को जलते अंगारों के रूप में सामने रखा, जिनसे आंखें चुरा पाना संभव नहीं।
44 साल पहले मुंबई के केइएम अस्पताल में कार्यरत नर्स अरुणा के साथ अस्पताल के ही बेसमेंट में बर्बर बलात्कार हुआ था। वह उस समय 25 वर्ष की थीं और जल्दी ही उनकी शादी होने वाली थी। अरुणा के साथ बलात्कार अस्पताल के ही एक वार्ड ब्वॉय सोहन लाल ने किया था जो पहले से ही उन पर बुरी नज़र रखता था। बलात्कार किए जाने के पहले उसने अरुणा के गले में कुत्ते की चेन बांध दी थी, जिससे उनके मस्तिष्क में ऑक्सीजन का प्रवाह रुक गया और वह कोमा में चली गईं। सोहन लाल को गिरफ़्तार कर लिया गया, पर सबूतों के अभाव में उस पर बलात्कार का मुकदमा नहीं चल सका। कोमा में चली जाने के कारण अरुणा कोई बयान दे पाने में असमर्थ थीं। मेडिकल जांच में बलात्कार की पुष्टि नहीं हो सकी। पता नहीं, डॉक्टरों पर किस तरह का दबाव था। पर बाद में की गई मेडिकल जांच में अरुणा के साथ बलात्कार की पुष्टि हुई, लेकिन अभियुक्त सोहन लाल पर सिर्फ़ हत्या के प्रयास और लूट का मामला दर्ज हुआ। उसने अरुणा की सोने की चेन और सगाई की अंगूठी छीन ली थी।
सोहन लाल को महज़ सात साल की सजा हुई। और अरुणा शानबाग अगले 42 वर्षों तक जिंदा लाश बनी केइएम अस्पताल के वार्ड नंबर-4 में जीवन और मौत से अनभिज्ञ पड़ी रही। इन 42 वर्षों के दौरान केइएम अस्पताल की नर्सों ने अरुणा शानबाग की जो सेवा की, वह मेडिकल इतिहास में बेमिसाल है। उनकी मृत्यु के बाद वहां की नर्सों को एक अजीब-से खालीपन ने घेर लिया था। यद्यपि अरुणा शानबाग के कोमा में होने के कारण उनका अस्तित्व महज भौतिक रूप में ही था, पर इतना भी वहां की नर्सों को संबल प्रदान करता था और उनके अपने अस्तित्व को भी रेखांकित करता था।
अरुणा शानबाग के नहीं रहने पर अब सिर्फ़ उनकी यादें हमारे साथ मौजूद हैं। बहरहाल, इतने साल गुज़र जाने के बावजूद आज भी समाज में स्त्रियों की दोयम दर्जे वाली स्थिति बरक़रार ही है। यह स्थिति निम्न वर्ग से लेकर तमाम वंचित वर्ग की स्त्रियों के साथ है। मध्य और उच्च वर्ग की महिलाओं के साथ बर्बर बलात्कार की वारदात कम ही होती है कुछ अपवादों के सिवा। यह अलग बात है कि यौन शोषण के मामले हर वर्ग और समुदाय की स्त्रियों के साथ कमोबेश होते ही हैं, पर निम्न और वंचित वर्ग की स्त्रियां बलात्कारियों की आसान शिकार होती हैं। स्त्रियों को अपना शिकार बनाने वाले भेड़िये तरह-तरह के रूप में घूमते नज़र आते हैं। ये आवारागर्द तत्वों से लेकर दबंग अपराधी और अय्याश अमीरजादे तक होते हैं जिन्हें न पुलिस का भय होता है, न ही न्यायालय का, क्योंकि अपने अनुभवों और पूर्व उदाहरणों से ये भली-भांति समझ जाते हैं कि कानून उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता, अगर वे किसी भी तरह उसे अपने पक्ष में प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।
अरुणा शानबाग के मामले में कानून अपना काम कर पाने में असफल रहा। वह एक बर्बर अपराधी के पक्ष में झुक गया। ऐसा क्यों? इसलिए कि ऐसी लोमहर्षक घटना को किसी ने गंभीरता से नहीं लिया। न अस्पताल प्रशासन, न पुलिस और न ही न्यायालय ने इस मामले में संवेदनशीलता दिखाई। सबूत इकट्ठे नहीं किए गए। मेडिकल जांच में डॉक्टरों ने कोताही बरती, क्योंकि अरुणा एक सामान्य नर्स थी। दूर-दराज के किसी गांव से नौकरी करने मुंबई जैसे महानगर में आई थी। हज़ारों-लाखों ऐसी औरतें गांवों से पलायन कर रोज़ी-रोज़गार के लिए महानगरों में आती हैं। कौन उनकी इज़्ज़त की परवाह करता है!
इतना ही नहीं, स्त्रियों की इज़्ज़त की जो गलत अवधारणा भारतीय मानस में गहराई से जड़ जमाये हुए है, वह भी बलात्कार की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए ज़िम्मेदार है। बलात्कार या यौन शोषण का मामला सामने आने पर परिवार के लोग उसे दबाना चाहते हैं। उनका मानना होता है कि मामला प्रकाश में आ जाने पर परिवार की बेइज़्ज़ती होगी। यही कारण है कि बलात्कार के अधिकांश मामलों में पुलिस में रिपोर्ट होती ही नहीं।अरुणा शानबाग मामले में भी उसके होने वाले पति ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराए जाने का विरोध किया था। दूसरी तरफ, पुलिस में मामला दर्ज कराए जाने के बावजूद न्यायिक प्रक्रिया की विसंगतियों के कारण शायद ही पीड़िताओं को न्याय मिल पाता है।
बलात्कार के बाद अरुणा शानबाग के जिंदा लाश में बदल जाने के बाद ‘ऐच्छिक मृत्यु’ का मुद्दा जोर-शोर से उठा और उसे न्यायालय से वैधता भी मिली। ये अलग बात है कि अरुणा शानबाग की सेवा में लगी नर्सों ने इसे उन पर लागू किए जाने से इनकार कर दिया।
भारतीय समाज और संस्कृति में बलात्कार की जड़ें बहुत ही गहरी हैं। अभिजात वर्ग बलात्कार को अपना परमाधिकार समझता रहा है। सामंती समाज से लेकर आज भी बलात्कार स्त्रियों पर अत्याचार का औज़ार बना हुआ है।
बलात्कार की हर घटना के बाद जब इसका बड़े पैमाने पर विरोध होता है तो लगता है कि इस प्रवृत्ति पर कुछ लगाम लगेगी। लेकिन बलात्कार के मामलों पर कानून सख्त किए जाने की जितनी बात होती है, बलात्कार की घटनाएं और भी बढ़-चढ़ कर सामने आने लगती हैं, मानो बलात्कारी कानून और शासन व्यवस्था को खुलेआम चुनौती देना चाहते हों। 2012 में दिल्ली निर्भया गैंगरेप की घटना के बाद बलात्कार संबंधी कानूनों की पुनर्समीक्षा की गई और इस संबंध में नए सिरे से कानूनों को परिभाषित किया गया। लेकिन कानून के भय से बलात्कार की घटनाओं में कोई कमी नहीं आई, बल्कि ये घटनाएं बढ़ी ही हैं।
अब निर्भया गैंगरेप के दोषियों की फांसी की सजा सुप्रीम कोर्ट ने बहाल रखी है, पर इसके बावजूद बलात्कार की घटनाएं रुक नहीं रहीं। अपराधियों में कानून का ख़ौफ नहीं है।
इससे स्पष्ट होता है कि बलात्कार की समस्या कानून-व्यवस्था से जुड़ी समस्या नहीं है, बल्कि यह समाज व्यवस्था से जुड़ी समस्या है। अमीरी-गरीबी और शोषण-दमन पर आधारित इस व्यवस्था में बलात्कार को मिटा पाना संभव नहीं है।
पुरुष वर्चस्व और हर स्तर पर स्त्री उत्पीड़न शोषणमूलक व्यवस्था का अपरिहार्य गुणधर्म है। यह व्यवस्था हज़ारों वर्षों से बदस्तूर कायम है। कानूनी उपायों और सुधारवादी प्रयासों से बलात्कार और स्त्री उत्पीड़न के विविध रूपों को समाप्त नहीं किया जा सकता है। स्त्री की वास्तविक आजादी एक समतावादी समाज में ही संभव है। शोषण पर आधारित सामाजिक व्यवस्था में स्त्री का स्थान दोयम दर्जे का है और रहेगा, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। यह ऐतिहासिक तथ्य है। स्त्री उत्पीड़न के रूप पूरी दुनिया में कमोबेश एक ही हैं। इसलिए स्त्री मुक्ति का संघर्ष सामाजिक व्यवस्था के बदलाव के संघर्ष से अलहदा नहीं हो सकता।
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Saturday, 21 January 2017

नदी की धारा में : वीणा भाटिया



When I met him in Delhi university law faculty he gifted me his books and said " array vina you're working according to your name".
My poem dedicated to him. May his soul rest in peace.

नदी की धारा में
हाथ डालना
छूना महसूस करना
कितनी बातें करती है
नदी हमसे
जाने कब से है धरती पर
कहाँ-कहाँ से गुज़र कर
कितने तट कितने रास्ते
पार करती बहती जा रही है
सबसे सरल सृजन है
बचपन के बनाए चित्रों में
जो सहजता से
बन जाती है
वो है नदी।

- वीणा भाटिया