Sunday, 21 May 2017

फिल्म रिव्यू वसंत विहार की झुग्गी बस्ती : हिन्दी मीडियम वीणा भाटिया

वसंत विहार की झुग्गी बस्ती : हिन्दी मीडियम

वीणा भाटिया

बॉलीवुड में कभी-कभी ही कोई ऐसी फिल्म बनती है जो किसी ज्वलंत समस्या पर विचार करने को मजबूर कर देती है। हिन्दी मीडियम एक ऐसी ही फिल्म है।

साकेत चौधरी निर्देशित यह फिल्म भारतीय मध्य वर्ग के जीवन की ऐसी विसंगति को उजागर करती है, जिस पर शायद ही किसी का ध्यान गया हो।

दरअसल, आजादी के सात दशक बीत जाने के बाद भी अंग्रेज़ी एक भाषा से ज्यादा स्टेटस सिंबल ही है। इंग्लिश मीडियम स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना हर व्यक्ति की चाहत होती है। इसी को देखते हुए आज बड़े शहर हों या छोटे कस्बे, हर जगह इंग्लिश मीडियम स्कूल खुल गए हैं। दरअसल, यह औपनिवेशिक गुलामी वाली मानसिकता का परिणाम है।

आज अंग्रेजी पढ़ना-लिखना और बोलना ही शिक्षित होने का पर्याय बन गया है। उच्च शिक्षा संस्थानों में अंग्रेजी पूरी तरह हावी है। प्रशासन, न्यायपालिका, संसद हर जगह अंग्रेजी का ही सिक्का चलता है। सामान्य परिवारों के बच्चे प्रतिभाशाली होते हुए भी सिर्फ अंग्रेजी की अच्छी जानकारी नहीं होने के कारण पिछड़ जाते हैं।

उल्लेखनीय है कि महात्मा गांधी ने अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दिए जाने का विरोध किया था, पर आजादी के बाद भी अंग्रेजी का प्रभाव हर क्षेत्र में बना रहा। कहा जा सकता है कि अंग्रेजी के प्रति आकर्षण उस मानसिक गुलामी को दर्शाता है जो दो सौ वर्षों के औपनिवेशिक शासन का परिणाम है। यह एक ऐसी सच्चाई है जिससे आंखें नहीं चुराई जा सकती। इससे कई तरह की विडंबनाएं पैदा हुई हैं, जो कई बार बहुत ही त्रासद तो हास्यास्पद भी हो जाती हैं।

इसी विडंबना को दिखाने की कोशिश ‘हिन्दी मीडियम’ में की गई है।

कहा जा सकता है कि यह अपने तरह की खास ही फिल्म है जो दर्शकों को गुदगुदाने, उनका मनोरंजन करने के साथ ही अपना संदेश देने में पूरी तरह सफल रही है।    

फिल्म की कहानी दिल्ली के चांदनी चौक में रहने वाले कपड़ों के विक्रेता राज बत्रा (इरफान खान) की है जिसने हिन्दी मीडियम से पढ़ाई  की और उसे टूटी-फूटी अंग्रेजी भी आती है। लेकिन उसकी पत्नी मीता (सबा कमर) को अच्छी अंग्रेजी आती है और वह चाहती है कि उसकी बच्ची पिया टॉप के अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाई करे। उसके एडमिशन के लिए राज और मीता बहुत कोशिश करते हैं और एडमिशन से पहले माता-पिता के इंटरव्यू के दौरान उन्हें बहुत परेशानी उठानी पड़ती है। इस सबके बावजूद जब पिया का नाम किसी कॉन्वेंट स्कूल की लिस्ट में नहीं आता तो राज फर्जी डॉक्युमेंट के सहारे बीपीएल कोटे से पिया का एडमिशन कराने की कोशिश शुरू करता है और वसंत विहार जैसे पॉश जगह से एक झुग्गी बस्ती में शिफ्ट हो जाता है। मीता वहां गरीबों की तरह रहती है और राज फैक्ट्री में काम करने के लिए जाने लगता है।

ये सब कुछ केवल इंग्लिश मीडियम में बच्चे की पढ़ाई के लिए। जाहिर है, यह अतिरंजना भी विडंबना को सामने लाने के लिए ही दिखाई गई है।

झुग्गी बस्ती में दीपक डोबरियाल सामने आते हैं। वे भी बीपीएल कोटे से अपने बेटे का एडमिशन उसी स्कूल में कराना चाह रहे हैं जिसमें राज की बेटी ने फॉर्म भर रखा है। फिल्म में फैक्ट्री वर्कर श्याम के तौर पर उनकी भूमिका कमाल की है।

इरफान और दीपक डोबरियाल का अभिनय बहुत ही सधा हुआ है। सहज और स्वाभाविक अभिनय के साथ वे जो हास्य पैदा करते हैं, वह दर्शकों को बांध लेने वाला है।

अभिनय में पाकिस्तानी अभिनेत्री सबा कमर जरा भी उनसे पीछे नहीं हैं। भारतीय परिवेश में अपने किरदार को सबा कमर ने बहुत अच्‍छी तरह निभाया है।

यह फिल्‍म इरफान की अदाकारी, कॉमिक और संवाद अदायगी के लिए यादगार रहेगी। साधारण संवादों में सिर्फ अपने खास अंदाज से वे हास्‍य और व्‍यंग्‍य पैदा करते हैं। उनका हास्य और व्यंग्य बेध कर रख देने वाला है। वे हर उस पिता का प्रतिनिधित्व करते लगते हैं जो अपने बच्चे को अंग्रेजी मीडियम में पढ़ाने का दबाव झेल रहा है।

कहा जा सकता है कि ‘हिन्दी मीडियम' एक ऐसी जरूरी फिल्‍म है, जिसे अवश्य देखा जाना चाहिए। फिल्म में व्यंग्य के छींटे किस कदर पड़ते हैं, उसकी एक बानगी देखें। राज बत्रा कहता है – “इंग्लिश इज इंडिया एंड इंडिया इज इंग्लिश। ह्वेन फ्रांस बंदा, जर्मन बंदा स्‍पीक रौंग इंग्लिश, वी नो प्राब्‍लम। एक इंडियन बंदा से रौंग इंग्लिश, तो बंदा ही बेकार हो जाता है जी।“

कहा जा सकता है कि अंग्रेजी के अनपेक्षित प्रभाव के मुद्दे को उठा कर इस फिल्म ने एक बड़ी ऐतिहासिक-सामाजिक विसंगति को जाहिर तो किया ही है, एक बड़ा सवाल भी दर्शकों के सामने रखा है। जाहिर है, इस सवाल से संवेदनशील दर्शकों को ही जूझना है।

कलाकार : इरफान खान, सबा कमर, स्वाति दास, दिशिता और दीपक डोबरियाल

निर्देशक : साकेत चौधरी
http://www.hastakshep.com/hindinews/hindi-medium-film-review-14182

अरुणा शानबाग की याद में वीणा भाटिया



http://www.hastakshep.com/hindiopinion/aruna-shanbaug-rape-alive-zombies-indian-society-culture-roots-of-rape-1416218 मई, 2015 को 62 साल की अरुणा रामचंद्र शानबाग की 42 वर्षों तक लगातार कोमा में रहने के बाद मृत्यु हो गई थी। वे कोई असाधारण महिला नहीं थीं। पर उनके जीवन और मौत में कुछ तो असाधारणता थी, जिसने संवेदनशील लोगों, बुद्धिजीवियों और महिला अधिकार के लिए लड़ने वाले लोगों के दिलो-दिमाग में एक जुंबिश पैदा की। अरुणा की मौत ने एक बार फिर उन सवालों को जलते अंगारों के रूप में सामने रखा, जिनसे आंखें चुरा पाना संभव नहीं।
44 साल पहले मुंबई के केइएम अस्पताल में कार्यरत नर्स अरुणा के साथ अस्पताल के ही बेसमेंट में बर्बर बलात्कार हुआ था। वह उस समय 25 वर्ष की थीं और जल्दी ही उनकी शादी होने वाली थी। अरुणा के साथ बलात्कार अस्पताल के ही एक वार्ड ब्वॉय सोहन लाल ने किया था जो पहले से ही उन पर बुरी नज़र रखता था। बलात्कार किए जाने के पहले उसने अरुणा के गले में कुत्ते की चेन बांध दी थी, जिससे उनके मस्तिष्क में ऑक्सीजन का प्रवाह रुक गया और वह कोमा में चली गईं। सोहन लाल को गिरफ़्तार कर लिया गया, पर सबूतों के अभाव में उस पर बलात्कार का मुकदमा नहीं चल सका। कोमा में चली जाने के कारण अरुणा कोई बयान दे पाने में असमर्थ थीं। मेडिकल जांच में बलात्कार की पुष्टि नहीं हो सकी। पता नहीं, डॉक्टरों पर किस तरह का दबाव था। पर बाद में की गई मेडिकल जांच में अरुणा के साथ बलात्कार की पुष्टि हुई, लेकिन अभियुक्त सोहन लाल पर सिर्फ़ हत्या के प्रयास और लूट का मामला दर्ज हुआ। उसने अरुणा की सोने की चेन और सगाई की अंगूठी छीन ली थी।
सोहन लाल को महज़ सात साल की सजा हुई। और अरुणा शानबाग अगले 42 वर्षों तक जिंदा लाश बनी केइएम अस्पताल के वार्ड नंबर-4 में जीवन और मौत से अनभिज्ञ पड़ी रही। इन 42 वर्षों के दौरान केइएम अस्पताल की नर्सों ने अरुणा शानबाग की जो सेवा की, वह मेडिकल इतिहास में बेमिसाल है। उनकी मृत्यु के बाद वहां की नर्सों को एक अजीब-से खालीपन ने घेर लिया था। यद्यपि अरुणा शानबाग के कोमा में होने के कारण उनका अस्तित्व महज भौतिक रूप में ही था, पर इतना भी वहां की नर्सों को संबल प्रदान करता था और उनके अपने अस्तित्व को भी रेखांकित करता था।
अरुणा शानबाग के नहीं रहने पर अब सिर्फ़ उनकी यादें हमारे साथ मौजूद हैं। बहरहाल, इतने साल गुज़र जाने के बावजूद आज भी समाज में स्त्रियों की दोयम दर्जे वाली स्थिति बरक़रार ही है। यह स्थिति निम्न वर्ग से लेकर तमाम वंचित वर्ग की स्त्रियों के साथ है। मध्य और उच्च वर्ग की महिलाओं के साथ बर्बर बलात्कार की वारदात कम ही होती है कुछ अपवादों के सिवा। यह अलग बात है कि यौन शोषण के मामले हर वर्ग और समुदाय की स्त्रियों के साथ कमोबेश होते ही हैं, पर निम्न और वंचित वर्ग की स्त्रियां बलात्कारियों की आसान शिकार होती हैं। स्त्रियों को अपना शिकार बनाने वाले भेड़िये तरह-तरह के रूप में घूमते नज़र आते हैं। ये आवारागर्द तत्वों से लेकर दबंग अपराधी और अय्याश अमीरजादे तक होते हैं जिन्हें न पुलिस का भय होता है, न ही न्यायालय का, क्योंकि अपने अनुभवों और पूर्व उदाहरणों से ये भली-भांति समझ जाते हैं कि कानून उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता, अगर वे किसी भी तरह उसे अपने पक्ष में प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।
अरुणा शानबाग के मामले में कानून अपना काम कर पाने में असफल रहा। वह एक बर्बर अपराधी के पक्ष में झुक गया। ऐसा क्यों? इसलिए कि ऐसी लोमहर्षक घटना को किसी ने गंभीरता से नहीं लिया। न अस्पताल प्रशासन, न पुलिस और न ही न्यायालय ने इस मामले में संवेदनशीलता दिखाई। सबूत इकट्ठे नहीं किए गए। मेडिकल जांच में डॉक्टरों ने कोताही बरती, क्योंकि अरुणा एक सामान्य नर्स थी। दूर-दराज के किसी गांव से नौकरी करने मुंबई जैसे महानगर में आई थी। हज़ारों-लाखों ऐसी औरतें गांवों से पलायन कर रोज़ी-रोज़गार के लिए महानगरों में आती हैं। कौन उनकी इज़्ज़त की परवाह करता है!
इतना ही नहीं, स्त्रियों की इज़्ज़त की जो गलत अवधारणा भारतीय मानस में गहराई से जड़ जमाये हुए है, वह भी बलात्कार की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए ज़िम्मेदार है। बलात्कार या यौन शोषण का मामला सामने आने पर परिवार के लोग उसे दबाना चाहते हैं। उनका मानना होता है कि मामला प्रकाश में आ जाने पर परिवार की बेइज़्ज़ती होगी। यही कारण है कि बलात्कार के अधिकांश मामलों में पुलिस में रिपोर्ट होती ही नहीं।अरुणा शानबाग मामले में भी उसके होने वाले पति ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराए जाने का विरोध किया था। दूसरी तरफ, पुलिस में मामला दर्ज कराए जाने के बावजूद न्यायिक प्रक्रिया की विसंगतियों के कारण शायद ही पीड़िताओं को न्याय मिल पाता है।
बलात्कार के बाद अरुणा शानबाग के जिंदा लाश में बदल जाने के बाद ‘ऐच्छिक मृत्यु’ का मुद्दा जोर-शोर से उठा और उसे न्यायालय से वैधता भी मिली। ये अलग बात है कि अरुणा शानबाग की सेवा में लगी नर्सों ने इसे उन पर लागू किए जाने से इनकार कर दिया।
भारतीय समाज और संस्कृति में बलात्कार की जड़ें बहुत ही गहरी हैं। अभिजात वर्ग बलात्कार को अपना परमाधिकार समझता रहा है। सामंती समाज से लेकर आज भी बलात्कार स्त्रियों पर अत्याचार का औज़ार बना हुआ है।
बलात्कार की हर घटना के बाद जब इसका बड़े पैमाने पर विरोध होता है तो लगता है कि इस प्रवृत्ति पर कुछ लगाम लगेगी। लेकिन बलात्कार के मामलों पर कानून सख्त किए जाने की जितनी बात होती है, बलात्कार की घटनाएं और भी बढ़-चढ़ कर सामने आने लगती हैं, मानो बलात्कारी कानून और शासन व्यवस्था को खुलेआम चुनौती देना चाहते हों। 2012 में दिल्ली निर्भया गैंगरेप की घटना के बाद बलात्कार संबंधी कानूनों की पुनर्समीक्षा की गई और इस संबंध में नए सिरे से कानूनों को परिभाषित किया गया। लेकिन कानून के भय से बलात्कार की घटनाओं में कोई कमी नहीं आई, बल्कि ये घटनाएं बढ़ी ही हैं।
अब निर्भया गैंगरेप के दोषियों की फांसी की सजा सुप्रीम कोर्ट ने बहाल रखी है, पर इसके बावजूद बलात्कार की घटनाएं रुक नहीं रहीं। अपराधियों में कानून का ख़ौफ नहीं है।
इससे स्पष्ट होता है कि बलात्कार की समस्या कानून-व्यवस्था से जुड़ी समस्या नहीं है, बल्कि यह समाज व्यवस्था से जुड़ी समस्या है। अमीरी-गरीबी और शोषण-दमन पर आधारित इस व्यवस्था में बलात्कार को मिटा पाना संभव नहीं है।
पुरुष वर्चस्व और हर स्तर पर स्त्री उत्पीड़न शोषणमूलक व्यवस्था का अपरिहार्य गुणधर्म है। यह व्यवस्था हज़ारों वर्षों से बदस्तूर कायम है। कानूनी उपायों और सुधारवादी प्रयासों से बलात्कार और स्त्री उत्पीड़न के विविध रूपों को समाप्त नहीं किया जा सकता है। स्त्री की वास्तविक आजादी एक समतावादी समाज में ही संभव है। शोषण पर आधारित सामाजिक व्यवस्था में स्त्री का स्थान दोयम दर्जे का है और रहेगा, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। यह ऐतिहासिक तथ्य है। स्त्री उत्पीड़न के रूप पूरी दुनिया में कमोबेश एक ही हैं। इसलिए स्त्री मुक्ति का संघर्ष सामाजिक व्यवस्था के बदलाव के संघर्ष से अलहदा नहीं हो सकता।
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Saturday, 21 January 2017

नदी की धारा में : वीणा भाटिया



When I met him in Delhi university law faculty he gifted me his books and said " array vina you're working according to your name".
My poem dedicated to him. May his soul rest in peace.

नदी की धारा में
हाथ डालना
छूना महसूस करना
कितनी बातें करती है
नदी हमसे
जाने कब से है धरती पर
कहाँ-कहाँ से गुज़र कर
कितने तट कितने रास्ते
पार करती बहती जा रही है
सबसे सरल सृजन है
बचपन के बनाए चित्रों में
जो सहजता से
बन जाती है
वो है नदी।

- वीणा भाटिया



                                      http://epaper.dainiktribuneonline.com/c/15674593

पुस्तक समीक्षा : वहाँ पानी नहीं है : दर्द को जुबान देती कविताएँ- वीणा भाटिया





‘वहाँ पानी नहीं है’ दिविक रमेश का नवीनतम कविता-संग्रह है। इसके पूर्व इनके नौ कविता-संग्रह आ चुके हैं। ‘गेहूँ घर आया है’ इनकी चुनी हुई कविताओं का प्रतिनिधि संग्रह है। गत वर्ष ‘माँ गाँव में है’ संग्रह आया और बहुचर्चित हुआ। प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह ने दिविक रमेश को वृहत्तर सरोकार का कवि बताते हुए लिखा है कि लेखन के क्षेत्र में वे अभी भी एक युवा की तरह ही सक्रिय हैं। इनकी कविताओं के बारे में शमशेर बहादुर सिंह ने लिखा है कि ये उस गहरी वास्तविक चिंता को व्यक्त करती हैं, जिसका संबंध मानव-मात्र के जीने-मरने से है। त्रिलोचन ने हमेशा इन्हें जन-जीवन से जुड़ा लोकवादी कवि माना। इन्होंने पिटे-पिटाए ढर्रे पर रचना नहीं की, हमेशा काव्य में नये प्रयोग किए और हिन्दी की उस प्रगतिशील जातीय चेतना को आगे बढ़ाया, जिसके वाहक निराला, नागार्जुन, त्रिलोचन, केदार, मुक्तिबोध और शमशेर रहे हैं।
कविता संग्रह ‘वहाँ पानी नहीं है’ को पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि इसमें शामिल कविताएँ कवि की दशकों की काव्य-यात्रा का एक नया ही पड़ाव है, जहां हिन्दी कविता अंतर्वस्तु और रूप-विधान, दोनों ही दृष्टि से लोक में समाहित हो गई है। संग्रह में कुल चौंसठ कविताएँ हैं। हर कविता अपने कथ्य, संवेदना और शिल्प में भिन्न है। इन कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि कवि का लोगों से, पूरे परिवेश और प्रकृति से बहुत ही गहरा और आत्मीय रिश्ता है। कवि अपनी जानी-पहचानी दुनिया में विचरता है और संवाद करता है, वह संवेदना के अति सूक्ष्म स्तर पर अपना सरोकार बनाता है। संग्रह में शामिल कविताएँ पहले की कविताओं से इस रूप में भिन्न हैं कि इनमें काव्य-संवेदना और कला का चरमोत्कर्ष दिखाई देता है। एक खास बात है कि दिविक रमेश की इधर की कविताओं में माँ बार-बार आती है। पिछले साल जो संग्रह आया, उसका शीर्षक ही है ‘माँ गाँव में है’। माँ के प्रति यह विशेष लगाव और आकर्षण निश्चय ही इस समाज में माँ की बदलती जा रही स्थिति को इंगित करता है। संग्रह की पहली ही कविता है – माँ के पंख नहीं होते। “माँ के पंख नहीं होते / कुतर देते हैं उन्हें / होते ही पैदा / खुद उसी के बच्चे। माँ के पंख नहीं होते।” यह उस माँ की कविता है जो पिटती थी और जब-जब पिटती थी माँ…लगभग गाती और रोती थी माँ। माँ को लेकर हिन्दी में न जाने कितनी कविताएँ लिखी गई होंगी, पर यह माँ पर ऐसी कविता है जो यथार्थ है और ऐसी विडम्बना को सामने लाती है जो इस अति आधुनिक समाज का नंगा कड़वा सच है। दूसरी कविता है ‘आवाज आग भी तो हो सकती है’। किस सांकेतिकता के साथ कहा है कवि ने – ‘आवाज आग भी तो हो सकती है/ भले ही वह/ चूल्हे ही की क्यों न हो, ख़ामोश’। ‘तू तो है न मेरे पास’ कविता में फिर माँ है। ‘सोचता हूँ क्या था कारण -/ माँ को ही नहीं लेना आया सपना / या सपने की ही नहीं थी पहुँच माँ तक।’ इस विडम्बनात्मक सच को कवि जब कविता में सामने लाता है तो जाहिर है, इसकी रचना-प्रक्रिया बहुत ही दर्द भरी रही होगी। सूक्ष्म संवेदनाओं की बुनावट वाली कई कविताएँ इस संग्रह में हैं, वहीं राजनीतिक पतनशीलता पर बहुत ही सूक्ष्म प्रहार करती और इतिहास के सवालों से टकराती कविताएँ भी हैं। संग्रह की प्रतिनिधि कविता ‘वहाँ पानी नहीं है’ एक ऐसी कविता है जिसमें आज के समग्र यथार्थ का ही उद्भेदन हुआ है। यह कविता शोषण पर आधारित समाज-व्यवस्था पर ऐसी गहरी चोट करती है और जो सवाल करती है, वह मर्मभेदी है। यद्यपि पानी पर बहुत से कवियों ने कविताएँ लिखी हैं। रघुवीर सहाय की कविता ‘पानी पानी’ तो बहुचर्चित रही है। पर ‘वहाँ पानी नहीं है’ हिन्दी कविता की एक नई उपलब्धि है। निश्चय ही, यह युग सत्य को सामने लाने वाली कविता है। इसका पहला और अंतिम अंश उद्धृत करना आवश्यक लग रहा है।
“वहाँ पानी नहीं है।”
सुन कर या पढ़ कर
क्यों नहीं उठता सवाल
कि वहाँ पानी क्यों नहीं है।

“वहाँ पानी नहीं है।”
सुन कर या पढ़ कर
अगर कोई हँस रहा है
तो वह है इक्कीसवीं सदी।
इस शुरुआत और अंत के बीच जिस विडम्बना को प्रस्तुत किया गया है, उसका बोध तो पूरी कविता को पढ़ने के बाद ही हो सकता है। निस्संदेह यह कविता हिन्दी की श्रेष्ठ कविताओं में एक है। ‘उनका दर्द-मेरी जुबान’ भी गहरी त्रासदी को सामने लाने वाली कविता है। संग्रह में कुछ बहुत ही कोमल संवेदनाओं की भी कविताएँ है – प्रेम कविताएँ, पर उनका फ़लक बहुत ही विस्तृत है। ‘शब्द भर होता प्यार’, ‘तुम्हारी नाव के लिए’, ‘करना प्रतीक्षा’, ‘सबसे निजी और खूबसूरत’, ‘बस बजता रहूँगा’, ‘अपने पक्षी की तलाश में’ बहुत ही सघन संवेदना और अनुभूतियों की कविताएँ हैं। ‘प्रियवर का फोन’ में साहित्य की राजनीति पर प्रहार है। ऐसे तो संग्रह में शामिल सभी कविताएँ उल्लेखनीय हैं, पर ‘जिसे चाहता हूँ भाषा में’ कविता का जिक्र जरूरी है। यह गहन अर्थबोध की कविता है और बहुआयामी है।
कहा जा सकता है कि दिविक रमेश के इस संग्रह में जो कविताएँ शामिल हैं, वो कथ्य, रूप-विधान, शिल्प और अर्थबोध की व्यापकता की दृष्टि से हिन्दी साहित्य की उपलब्धि हैं। दिविक रमेश कविताओं में जिस तरह शब्दों को बरतते हैं, उससे एक सांगीतिक रचना भी होती है। उनकी कविताओं में जो संगीत-तत्व है, उसे इस संग्रह को पढ़ते हुए महसूस किया जा सकता है। उनकी कविताएँ हृदय में संगीत-ध्वनियों की तरह बजने वाली हैं।

पुस्तक – वहाँ पानी नहीं है (कविता संग्रह), दिविक रमेश
प्रकाशक – बोधि प्रकाशन, जयपुर
प्रथम संस्करण – 2016
मूल्य – 125 रुपए
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