Sunday, 13 September 2015

भगवत रावत : हिंदी की लोक परंपरा के प्रतिनिधि कवि

-    वीणा भाटिया




आंखें जब सब कुछ देखते हुए भी नहीं देखतीं
कान के पर्दे जब किसी आवाज़ पर नहीं कांपते
हाथ-पैर जब किसी घटना पर नहीं हिलते-डुलते
असर नहीं करती जब नथुनों पर चारों ओर फैली सड़ांध
दिल जब धड़कते-धड़कते किसी बात पर नहीं धड़कता
क्या इसी तरह नहीं होती आदमी की मौत
क्या यह सब किसी खास लम्हे में ही होता है
फ़िर किसका किया जा रहा है इंतज़ार
कब होगी मौत की घोषणा ?
-    भगवत रावत

इस कविता को पढ़ते हुए अनायास क्रांतिकारी कवि पाश की प्रसिद्ध कविता सबसे ख़तरनाक की पंक्तियां दिमाग में कौंधने लगती हैं। सवाल है, उपरोक्त कविता में कवि मौत की प्रक्रिया का वर्णन करते हुए किसकी मौत की घोषणा के बारे में पूछ रहा है ? संघर्ष विमुख मध्यवर्गीय समाज पर इससे कड़ी और कोई टिप्पणी क्या संभव है ? पर सवाल का जवाब ढूंढना ज़रूरी है और इसके लिए ज़रूरी है भगवत रावत की कविताओं से साक्षात्कार करना।


भगवत रावत समकालीन हिंदी कविता में एक विशिष्ट स्थान रखते हैं। आज जब प्रगतिशीलता और जनवाद के नाम पर अधिकांश कविताएं जहां सपाटबयानी, जुमलेबाज़ी और कोरी भावुकता की अभिव्यक्ति मात्र रह गई हैं, भगवत रावत की कविता अपने कथ्य और रूप विधान में पूर्णत: यथार्थवादी है। इनकी रचनाशीलता का क्षेत्र अत्यंत ही व्यापक है। प्रकृति एवं समाज से कवि पूरी तरह एकात्म है। भाव-बोध के अत्यंत ही उच्च स्तर पर सृजित होने वाली उनकी कविताएं पाठकों-श्रोताओं को जटिल एवं संशलिष्ट यथार्थ के बहुविध पहलुओं से सामान्यीकृत कराती हैं। संवेदना के स्तर पर भगवत रावत की कविताएं पाठकों को झकझोरने के साथ ही उसके मन में बजती हैं। स्वयं कवि का कहना है कि जो कविताएं पाठकों के मन में नहीं बजे उन्हें कविता मानने में संदेह होता है। रावत की कविताओं में जहां चुप्पी है, वह भी कुछ न कुछ कहती है...काव्य पंक्तियों के बीच की खाली जगहें, संकेत-चिह्न...सब कुछ अभिव्यक्ति को गंभीर अर्थ प्रदान करने वाले हैं। स्पष्ट है कि कवि अद्भुत शिल्प-विधान की रचना करता है जो काव्य अभिव्यक्ति के क्षेत्र में प्रयोग के नए प्रतिदर्श बन जाते हैं। पर इससे यह समझना ग़लत होगा कि रावत शिल्प पर ज़ोर देते हुए पूर्णत: प्रयोगधर्मी कवि हैं, सच तो यह है कि इनकी कविता विचारों की सान पर धारदार होती चली गई है।


वैसे, कवि का मानना है कि लिखित होना आज कविता की नियति बन चुकी है, पर मूलत: यह उच्चरित ध्वनि है और अलग-अलग मन:स्थितियों में सुनने अथवा पढ़े जाने पर अलग छवियां दृश्यमान करती हैं। रावत कहते हैं, आज हिंदी कविता कुछ इतनी लिखित होती जा रही है कि धीरे-धीरे सामान्य मनुष्य की भाषा, उसकी प्रकृति, बोली-बानी और रूप-रंग से दूर होती जा रही है। स्पष्ट है कि आज कविता के नाम पर जो कुछ लिखा जा रहा है, उसमें काफी दोहराव और विवरणात्मकता है, जबकि कविता एक सूक्ष्म और जटिल विधा है। 


रावत यह भी कहते हैं, अपने समय की घटनाओं, दुर्घटनाओं, छल, प्रपंच, पाखंड, प्रेम, करुणा, षड्यंत्र, राजनीति आदि से विमुख होकर आज की कविता संभव नहीं है। यही कारण है कि आज की कविता मात्र संवेदना नहीं जगाती, वह आंखें भी खोलती है। वह करुणा और प्रेम में ही नहीं डुबाती, व्याकुल भी बनाती है। इसलिए वह समाज की सामूहिक चेतना की रचनात्मकता का प्रतीक है। मुक्तिबोध की शब्दावली में वह हमारी चेतना का रक्तप्लावित स्वर भी है। जीवन की तमाम जटिल अनुभूतियों और स्थितियों में जाते हुए वह कई बार जटिल भी हो जाती है। कविता को आवश्यकतानुसार इतना जटिल होने की छूट मिलनी चाहिए। बावजूद भगवत रावत की कविताएं मुक्तिबोध की कविताओं का भांति इतनी जटिल नहीं कि आम पाठकों के पल्ले ही न पड़ें। अधिकांश कविताएं सहज संप्रेषणीय हैं। पर जैसा कि पहले कहा गया है, अलग-अलग मन:स्थितियों में कविता में अलग-अलग अर्थ छवियां संप्रेषित होती हैं। भगवत रावत इस दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण कवि हैं कि इनकी कविता पूरी तरह लोक से जुड़ी हुई है। लोकचेतना से इनकी कविता किस हद तक संपृक्त है, इसे हे बाबा तुलसीदास, बोल मसीहा, बुन्देली में चार कविताएं, ईसुरी और रजऊ के नाम, बैलगाड़ी, अथ रूपकुमार कथा और सुनो हिरामन जैसी लंबी कविताओं में देखा जा सकता है। वह मां ही थी, सोच रही है गंगाबाई, कचरा बीनती लड़कियां और भरोसा जैसी न जाने कितनी कविताएं हैं जो लोक से कवि की प्रतिबद्धता को दिखाती हैं।


वस्तुत: भगवत रावत हिंदी कविता की समृद्ध लोक परंपरा के श्रेष्ठ कवियों में एक हैं। काव्य की इस लोक परंपरा की जड़ें उत्तर मध्य काल के भक्ति आंदोलन में हैं। समकालीन सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों में कविता की लोकधारा उस जन से जुड़ जाती है जो कवि त्रिलोचन के शब्दों में भूखा है दूखा है कला नहीं जानता...। इस सांस्कृतिक परिवेश में कवि मानुष गंध की पहचान करने की कोशिश करता है। वह मानव संस्कृति को ख़तरे में डालने वालों से लोगों को सावधान करना ज़रूरी समझता है जो आयुधों के यान पर सवार हो कर आ रहे हैं। वर्तमान राजनीतिक-आर्थिक परिवेश में श्रमजीवियों के जैविक अस्तित्व पर मंडरा रहे ख़तरों से क्षुब्ध हो कर वह यह कहने को मजबूर हो उठता है कि क्या इसी के लिए धारण की थी देह ?’ वहीं, अनेकानेक कविताओं में वह वर्तमान सभ्यता और संस्कृति के अंतर्विरोधों को बड़े ही सूक्ष्म स्तर पर उजागर करते हुए आज के उपभोक्ता समाज में जीवन की अर्थवत्ता पर सवाल खड़े करता है।


रावत की कविताओं में रूप-रंग-रस-गंध-नाद का वह निनाद है जो पाठकों को संतृप्त कर देता है। शमशेर की तरह रावत ध्वनि संकेतों से चित्र-रचना करते हैं। इस मायने में वे एक उच्च कोटि के कलाकार हैं। यह एक खास बात है कि रावत कविता को मूलत: एक श्रव्य माध्यम मानते हैं, ऐसा इसलिए कि वह लोक परंपरा के कवि हैं, उस सामाजिक परिवेश के कवि हैं, जिनमें त्रिलोचन की चंपा काले-काले अच्छर नहीं चीन्हती। कम से कम शब्दों में यही कहा जा सकता है रावत हिंदी की लोक परंपरा के, जिसकी धारा भक्ति काल से चली आ रही है, प्रतिनिधि कवि हैं।


भगवत रावत का जीवन प्रारंभ से ही संघर्षशील रहा। झांसी से एमए, बीएड करने के बाद इन्होंने प्राइमरी स्कूल में अध्यापन कार्य किया। फिर 1983 से 1994 तक रीडर पद पर कार्य किया। दो वर्ष तक मध्य प्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी के संचालक रहे। 1998 से 2001 तक क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान, भोपाल में हिंदी के प्रोफेसर तथा समाज विज्ञान और मानविकी शिक्षा विभाग के अध्यक्ष रहे। वे साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश साहित्य परिषद् के निदेशक भी रहे और मासिक पत्रिका साक्षात्कार का संपादन किया।


इनके प्रमुख कविता संग्रह हैं – समुद्र के बारे में (1977), दी हुई दुनिया (1981), हुआ कुछ इस तरह (1988), सुनो हिरामन (1992), सच पूछो तो (1996), हमने उनके घर देखे (2001), ऐसी कैसी नींद (2004)। 1993 में इनकी कविता का दूसरा पाठ शीर्षक से आलोचना की पुस्तक प्रकाशित हुई। इनकी रचनाएं मराठी, बांग्ला, उड़िया, कन्नड़, मलयालम, अंग्रेजी एवं जर्मन भाषा में अनूदित हुईं।


इन्हें 1979 में दुष्यंत कुमार पुरस्कार, 1989 में वागीश्वरी पुरस्कार और 1997-98 का शिखर सम्मान प्राप्त हुआ। शिक्षा के क्षेत्र में भी इनका उल्लेखनीय योगदान रहा। गुर्दे की बीमारी से पीड़ित भगवत रावत का निधन 26 मई, 2012 को भोपाल स्थित उनके घर पर हुआ। यह ठीक है कि भगवत रावत अब हमारे बीच नहीं हैं, पर उनकी कविताएं हमें यह अहसास कराती रहेंगी कि वे हमारे आसपास ही मौजूद हैं।   







Tuesday, 8 September 2015

गुलामी की पीड़ा : भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रासंगिकता




-    वीणा भाटिया/मनोज कुमार झा


 

 
आवहु सब मिल रोवहु भारत भाई
हा! हा!! भारत दुर्दशा देखि ना जाई।

ये पंक्तियां आधुनिक हिंदी के प्रवर्तक भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाटक भारत दुर्दशा की हैं। भारतीय नवजागरण और खासकर हिंदी नवजागरण के अग्रदूत के रूप में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने पहली बार अंग्रेजी राज पर कठोर प्रहार किया था। इसके साथ ही, उन्होंने अंग्रेजों के सबसे बड़े सहयोगी सामंतों पर भी चोट की थी। भारतेंदु का समय भारतीय इतिहास में बहुत ही बड़े उथल-पुथल से भरा था। उनके जन्म के ठीक सात साल बाद अंग्रेजी शासन के ख़िलाफ़ सबसे बड़ा जनविद्रोह हुआ था-1857 का ग़दर। इस ग़दर ने अंग्रेजों को भीतर से हिला दिया था और इसी के बाद अंग्रेज़ शासकों ने कुख्यात फूट डालो और राज करो की नीति अख़्तियार की थी, जिसका विघटनकारी प्रभाव आज तक बना हुआ है। 


भारतेंदु ने विदेशी शासन के दुष्प्रभावों और गुलामी की पीड़ा को बहुत ही गहराई से महसूस किया था। देश में आम जन की हालत बहुत ही बुरी थी। बार-बार पड़ने वाले अकालों ने किसानों की हालत खराब कर दी थी। वहीं, अंग्रेजों ने ग़दर के बाद बड़े पैमाने पर दमन चक्र चलाया था। यह देश की अस्मिता को कुचलने का प्रयास था। एक तरफ जहां लोगों में पस्तहिम्मती छाई थी, वहीं विद्रोही राजे-रजवाड़ों का दमन करने के बाद अंग्रेजों ने अपने पिट्ठू देशी शासकों को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया था। उल्लेखनीय है कि सन् 1793 में ही लार्ड कार्नवालिस ने कृषि के क्षेत्र में स्थाई बंदोबस्त यानी परमनानेंट सेटलमेंट की व्यवस्था लागू कर देश में जमींदारों का एक नया वर्ग तैयार किया था, जो अंग्रेजों के साथ मिलकर ग़रीब किसानों को लूटने में लगा हुआ था। ऐसे में, पहली बार भारतेंदु हरिश्चंद्र ने साहित्य में जन भावनाओं और आकांक्षाओं को स्वर दिया। पहली बार साहित्य में जन का समावेश भारतेंदु ने ही किया। उनके पहले काव्य में रीतिकालीन प्रवृत्तियों का ही बोलबाला था। साहित्य पतनशील सामंती संस्कृति का पोषक बन गया था, पर भारतेंदु ने उसे जनता की ग़रीबी, पराधीनता, विदेशी शासकों के अमानवीय शोषण के चित्रण और उसके विरोध का माध्यम बना दिया। अपने नाटकों, कवित्त, मुकरियों और प्रहसनों के माध्यम से उन्होंने अंग्रेजी राज पर कटाक्ष और प्रहार किए, जिसके चलते उन्हें अंग्रेजों का कोपभाजन भी बनना पड़ा।


भारतेंदु के समय में हिंदी का वर्तमान स्वरूप विकसित नहीं हो पाया था। राजकाज और संभ्रांत वर्ग की भाषा फारसी थी। वहीं, अंग्रेजी का वर्चस्व भी बढ़ता जा रहा था। साहित्य में ब्रजभाषा का बोलबाला था। फारसी के प्रभाव वाली उर्दू भी चलन में आ गई थी। ऐसे समय में भारतेंदु ने लोकभाषाओं और फारसी से मुक्त उर्दू के आधार पर खड़ी बोली का विकास किया। आज जो हिंदी हम लिखते-बोलते हैं, वह भारतेंदु की ही देन है। यह अलग बात है कि उस समय से अब तक हिंदी का काफी विकास हो चुका है, पर इसकी आधारशिला भारतेंदु ने ही रखी। यही कारण है कि उन्हें आधुनिक हिंदी का जनक माना जाता है। सिर्फ़ भाषा ही नहीं, साहित्य में उन्होंने नवीन आधुनिक चेतना का समावेश किया और साहित्य को जन से जोड़ा। भारतेंदु की रचनाओं में अंग्रेजी शासन का विरोध, स्वतंत्रता के लिए उद्दाम आकांक्षा और जातीय भावबोध की झलक मिलती है। सामंती जकड़न में फंसे समाज में आधुनिक चेतना के प्रसार के लिए लोगों को संगठित करने का प्रयास करना उस ज़माने में एक नई ही बात थी। उनके साहित्य और नवीन विचारों ने उस समय के तमाम साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों को झकझोरा और उनके इर्द-गिर्द राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत लेखकों का एक ऐसा समूह बन गया जिसे भारतेंदु मंडल के नाम से जाना जाता है।


भारतेंदु का जन्म बनारस के एक समृद्ध व्यवसायी परिवार में 9 सितंबर,1850 को हुआ था। उनके पिता गोपीचंद भी ब्रजभाषा में गिरिधर दास नाम से कविता लिखते थे। इस तरह, साहित्यिक संस्कार उन्हें घर में ही मिले। भारतेंदु ने बहुत ही कम उम्र में ही काव्य रचना शुरू कर दी थी और जल्दी ही साहित्यिक समाज में लोकप्रिय हो गए। बहुत ही कम उम्र में उनके माता-पिता का निधन हो गया था। उच्च शिक्षा के लिए उनका नामांकन बनारस के प्रसिद्ध क्वीन्स कॉलेज में कराया गया, पर परंपरागत शिक्षा पद्धति में उनका मन नहीं लगता था। यद्यपि कॉलेज की शिक्षा उन्होंने पूरी की, पर स्वाध्याय से अंग्रेजी, संस्कृत, मराठी, बांग्ला, गुजराती, पंजाबी, उर्दू और अन्य कई भाषाएं सीखी। उन दिनों बनारस में एक बड़े विद्वान और लेखक राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद थे, जिनके संपर्क में वे लगातार रहे, पर भाषा संबधी उनके विचारों से उनके मतभेद भी थे। भारतेंदु एक ऐसी भाषा के पक्षधर थे जो आम जनता से जुड़ी हो और आसानी से उसे समझ में आए। वे लोकभाषाओं के बहुत बड़े समर्थक थे। अपनी अंतर्दृष्टि से उन्होंने समझ लिया था कि लोकभाषाओं के आधार पर ही हिंदी को एक आधुनिक भाषा के रूप में विकसित किया जा सकता है। 


पंद्रह वर्ष की उम्र से ही भारतेंदु ने लेखन शुरू कर दिया था। उसी समय उन्होंने जनता की चेतना के विकास में पत्रकारिता के महत्त्व को समझ लिया था। महज अठारह वर्ष की उम्र में उन्होंने कविवचनसुधा नामक पत्रिका निकाली जिसमें उस समय के बड़े-बड़े विद्वानों की रचनाएं छपती थीं। उनकी प्रतिभा को नज़रअंदाज करना अंग्रेज शासकों के लिए संभव नहीं था। बीस वर्ष की उम्र में वे ऑनरेरी मैजिस्ट्रेट बनाए गए। लेकिन राष्ट्रवादी विचारों के कारण उन्होंने यह पद जल्दी ही छोड़ दिया और साहित्य रचना में लग गए। 1868 में 'कविवचनसुधा' का प्रकाशन करने के बाद 1873 में उन्होंने हरिश्चन्द्र मैगजीन' का प्रकाशन किया। उस ज़माने में जब स्त्रियों की शिक्षा और उनके उत्थान के प्रति किसी का ध्यान नहीं था, भारतेंदु ने  1874 में स्त्री शिक्षा के लिए 'बाला बोधिनी' नामक पत्रिका निकाली। साथ ही, उन्होंने कई साहित्यिक संस्थाओं का भी गठन किया। भारतेंदु की लोकप्रियता लगातार बढ़ती जा रही थी। देश भर के विद्वानों और लेखकों से उनका संपर्क स्थापित हो चुका था। उनकी लोकप्रियता से प्रभावित होकर काशी के विद्वानों ने 1880 में उन्हें 'भारतेंदु` की उपाधि प्रदान की।


भारतेंदु बहुमुखी प्रतिभासंपन्न लेखक थे। कम समय में इतने विपुल साहित्य की रचना शायद ही किसी दूसरे साहित्यकार ने की होगी। उनकी किताबों की सूची बहुत ही लंबी है। भारतेंदु ने हिंदी में नाट्य लेखन की शुरुआत की जो उनका खास योगदान है। इसके साथ ही, उन्होंने संस्कृत और अंग्रेजी से भी नाटकों का अनुवाद किया। काव्य के क्षेत्र में भी उन्होंने विपुल रचना की। यह अलग बात है कि कविता में उन्होंने खड़ी बोली का प्रयोग नहीं किया। भारतेंदु ने गद्य लेखन भी किया और साथ ही शिक्षा एवं समाज सुधार के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। भारतेंदु अंग्रेजों के शोषण तंत्र को भली-भांति समझते थे। अपनी पत्रिका कविवचनसुधा में उन्होंने लिखा था – जब अंग्रेज विलायत से आते हैं प्राय: कैसे दरिद्र होते हैं और जब हिंदुस्तान से अपने विलायत को जाते हैं तब कुबेर बनकर जाते हैं। इससे सिद्ध हुआ कि रोग और दुष्काल इन दोनों के मुख्य कारण अंग्रेज ही हैं। यही नहीं, 20वीं सदी की शुरुआत में दादाभाई नौरोजी ने धन के अपवहन यानी ड्रेन ऑफ वेल्थ के जिस सिद्धांत को प्रस्तुत किया था, भारतेंदु ने बहुत पहले ही शोषण के इस रूप को समझ लिया था। उन्होंने लिखा था – अंगरेजी राज सुखसाज सजे अति भारी, पर सब धन विदेश चलि जात ये ख्वारी। अंग्रेज भारत का धन अपने यहां लेकर चले जाते हैं और यही देश की जनता की ग़रीबी और कष्टों का मूल कारण है, इस सच्चाई को भारतेंदु ने समझ लिया था। कविवचनसुधा में उन्होंने जनता का आह्वान किया था – भाइयो! अब तो सन्नद्ध हो जाओ और ताल ठोक के इनके सामने खड़े तो हो जाओ देखो भारतवर्ष का धन जिसमें जाने न पावे वह उपाय करो। 


प्रख्यात आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है, भारतेंदु और उनके साथियों की नीति अंग्रेज शासकों की नीति से बिल्कुल उल्टी थी। अंग्रेज हिंदी को दबाते थे, भारतेंदु उसके अधिकारों के लिए लड़े थे। अंग्रेज हिंदुओं और मुसलमानों में फूट डालकर अपना राज कायम करना चाहते थे, भारतेंदु ने इनके एक होने की अपील की थी। अंग्रेज भारत को खेतिहर देश बनाकर उसे लूटना चाहते थे, भारतेंदु ने इस लूट का पर्दाफाश किया था और देश में कौशल और मशीन संबंधी शिक्षा की मांग की थी। डॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है कि भारतेंदु युग का साहित्य हिंदीभाषी जनता का जातीय साहित्य है, वह हमारे जातीय नवजागरण का साहित्य है। उस दौरान सिर्फ़ भारतेंदु ही नहीं, बल्कि उनसे प्रेरित होकर कई साहित्यकार सामने आए जिनमें बालकृष्ण भट्ट, राधाचरण गोस्वामी, प्रतापनारायण मिश्र और बालमुकुंद गुप्त प्रमुख हैं, जिन्होंने अपने लेखन के माध्यम से और पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन कर देश में नवीन चेतना जागृत करने की कोशिश की, जिसका मूल स्वर सामंतवाद और उपनिवेशवाद विरोधी था। भारतेंदु मंडल के इन लेखकों ने व्यंग्य को अपना मुख्य माध्यम बनाया और अंग्रेजी शासन के साथ-साथ सामंती कुरीतियों पर भी कड़ा प्रहार किया। भारतेंदु ने स्वयं कई प्रहसन लिखे जिसमें अंधेरनगरी बहुत ही लोकप्रिय है। यह आज भी प्रासंगिक है। इसका प्रमाण यह है कि आज भी इस प्रहसन का मंचन होता है। भारतेंदु ने अंग्रेजों की नीति का खुलासा करते हुए लिखा था –

भीतर भीतर सब रस चूसै, बाहर से तन मन धन मूसै।
जाहिर बातन में अति तेज, क्यों सखि साजन? नहिं अंग्रेज।।

ये तो एक उदाहरण है। अंग्रेजों की शिक्षा नीति किस तरह युवाओं को अपनी जड़ों से काटने वाली थी, किस तरह उन्हें परमुखापेक्षी बनाने के साथ बेरोजगारी की ओर धकेलने वाली थी, इस पर भी भारतेंदु ने लिखा है। भारतेंदु लोक साहित्य का प्रचार-प्रसार करना चाहते थे। उन्होंने लिखा था, भारतवर्ष की उन्नति के जो अनेक उपाय महात्मागण आजकल सोच रहे हैं, उनमें एक और उपाय होने की आवश्यकता है। इस विषय के बड़े-बड़े लेख और काव्य प्रकाश होते हैं, किंतु वे जनसाधारण के दृष्टिगोचर नहीं होते। इसके हेतु मैंने यह सोचा है कि जातीय संगीत की छोटी-छोटी पुस्तकें बनें और वे सारे देश, गांव-गांव में साधारण लोगों में प्रचार की जाएं। मेरी इच्छा है कि मैं ऐसे गीतों का संग्रह करूं और उनको छोटी-छोटी पुस्तकों में मुद्रित करूं। जाहिर है, भारतेंदु साहित्य को जन से जोड़ना चाहते थे।


भारतेंदु ने साहित्य के प्रकाशन और उसके प्रचार-प्रसार में अपना काफी धन खर्च किया था। उनका एक सपना था देश में हिंदी के एक बड़े विश्वविद्यालय की स्थापना करना। लेकिन धन की कमी के कारण उनका यह सपना पूरा नहीं हो पाया। इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि उनके जन्म के डेढ़ सौ साल से भी ज्यादा बीत जाने के बावजूद हिंदीभाषी समाज उनके सपने को पूरा कर पाने में समर्थ नहीं हो सका है। 


भारतेंदु के संपूर्ण लेखन का मूल स्वर साम्राज्यवाद-सामंतवाद विरोधी है। जिन सवालों से भारतेंदु दो-चार होते हैं, जिन मुद्दों को उठाते हैं, वे आज भी बने हुए हैं। भारत की दुर्दशा कम नहीं हुई है, बल्कि बढ़ती ही जा रही है। देश राजनीतिक तौर पर भले ही आजाद है, पर पूंजीवादी-साम्राज्यवादी शोषण के मकड़जाल से मुक्ति नहीं मिली है। किसानों का शोषण अंग्रेजी राज में जितना होता था, उससे कम आजाद भारत में नहीं हो रहा है। सांप्रदायिकता के जिस ख़तरे के प्रति भारतेंदु ने आगाह किया था, वह आज और भी उग्र रूप में सामने है। ऐसे में, भारतेंदु का लेखन आज और भी प्रासंगिक हो गया है। 


विपुल मात्रा और अनेक विधाओं में सृजन करने वाले भारतेंदु की मृत्यु महज 35 वर्ष की उम्र में 6 जनवरी 1885 को हो गई। भारतेंदु अपने समय से बहुत ही आगे थे। साहित्य में भी और राजनीतिक विचार में भी। उल्लेखनीय है कि जिस वर्ष उनका निधन हुआ, उसी वर्ष भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई, पर उस समय उसका स्वर साम्राज्य समर्थन का था, जबकि भारतेंदु ने बहुत पहले ही ब्रिटिश साम्राज्यवादी शोषण का हर स्तर पर प्रतिरोध किया था।
उनके निधन पर सही ही कहा गया – प्यारे हरीचंद की कहानी रह जाएगी। 

                     

Saturday, 5 September 2015

वारिस शाह नूं

- अमृता प्रीतम



आज्ज आखां वारिस शाह नूं
कित्थे कबरां विचों बोल ते आज्ज किताबे ईश्क दा
कोई अगला वर्का फोल
इक रोई सी धी पंजाब दी तूं लिख लिख मारे वैण
आज्ज लखां धिया रोंदियां तैनूं वारिस शाह नूं कैण
उठ दर्दमंदा देया दर्दिया उठ तक्क अपना पंजाब
आज्ज वेले लाशा विछियां ते लहू दी भरी चिनाव
किसे ने पंजा पाणियां विच दित्ती जहर रला
ते उणा पाणियां धरत नूं दित्ता पानी ला
इस जरखेज जमीन दे लू लू फुटिया जहर
गिट्ठ गिट्ठ चड़ियां लालियां ते फुट फुट चड़िया कहर
उहो वलिसी वा फिर वण वण वगी जा
उहने हर इक बांस दी वंजली दित्ती नाग बना
नागां किल्ले लोक मूं, बस फिर डांग्ग ही डांग्ग,
पल्लो पल्ली पंजाब दे, नीले पै गये अंग,
गलेयों टुट्टे गीत फिर, त्रखलों टुट्टी तंद,
त्रिंझणों टुट्टियां सहेलियां, चरखरे घूकर बंद
सने सेज दे बेड़ियां, लुड्डन दित्तीयां रोड़,
सने डालियां पींग आज्ज, पिपलां दित्ती तोड़,
जित्थे वजदी सी फूक प्यार दी, ओ वंझली गयी गवाच,
रांझे दे सब वीर आज्ज भुल गये उसदी जाच्च
धरती ते लहू वसिया, कब्रां पइयां चोण,
प्रीत दिया शाहाजादियां अज्ज विच्च मजारां रोन,
आज्ज सब्बे कैदों* बन गये, हुस्न इश्क दे चोर
आज्ज कित्थों लाब्ब के लयाइये वारिस शाह इक होर।

Friday, 14 August 2015

किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है?

       

  
- नागार्जुन 


किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है ?
कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्त है ?
सेठ है, शोषक है, नामी गला-काटू है,
गालियां भी सुनता है, भारी थूक-चाटू है,
चोर है, डाकू है, झूठा-मक्कार है,
कातिल है, छलिया है, लुच्चा-लबार है,
जैसे भी टिकट मिला, जहां भी टिकट मिला,
शासन के घोड़े पर वह भी सवार है,
उसी की जनवरी छब्बीस,
उसी का पंद्रह अगस्त है !

बाकी सब दुखी है, बाकी सब पस्त है,
कौन है खिला-खिला, बुझा-बुझा कौन है,
कौन है बुलंद आज, कौन आज मस्त है,
खिला-खिला सेठ है, श्रमिक है बुझा-बुझा,
मालिक बुलंद है, कुली-मजूर पस्त है,
सेठ यहां सुखी है, सेठ यहां मस्त है,
उसकी है जनवरी, उसी का अगस्त है !

पटना है, दिल्ली है, वहीं सब जुगाड़ है,
मेला है, ठेला है, भारी भीड़-भाड़ है,
फ्रिज है, सोफा है, बिजली का झाड़ है,
फैशन की ओट है, सबकुछ उघाड़ है,
पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है,
गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो,
मास्टर की छाती में कै ठो हाड़ है !
गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो,
मजदूर की छाती में कै ठो हाड़ है !
गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो,
घरनी की छाती में कै ठो हाड़ है !
गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो,
बच्चे की छाती में कै ठो हाड़ है !
देख लो जी, देख लो, देख लो जी, देख लो,
पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है !

मेला है, ठेला है, भारी भीड़-भाड़ है,
पटना है, दिल्ली है, वहीं सब जुगाड़ है,
फ्रिज है, सोफा है, बिजली का झाड़ है,
फैशन की ओट है, सबकुछ उघाड़ है,
महल आबाद है, झोपड़ी उजाड़ है,
गरीबों की बस्ती में उखाड़ है, पछाड़ है,
धत तेरी, धत तेरी, कुच्छो नहीं! कुच्छो नहीं,
ताड़ का तिल है, तिल का ताड़ है,
ताड़ के पत्ते हैं, पत्तों के पंखे हैं,
पंखों की ओट है, पंखों की आड़ है,
कुच्छो नहीं, कुच्छो नहीं,
ताड़ का तिल है, तिल का ताड़ है,
पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है !
किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है !

कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्त है !
सेठ ही सुखी है, सेठ ही मस्त है,
मंत्री ही सुखी है, मंत्री ही मस्त है,
उसी की है जनवरी, उसी का अगस्त है ।

Saturday, 8 August 2015

भीष्म साहनी : जैसा जिया वैसा लिखा

जन्म शताब्दी पर विशेष

- वीणा भाटिया

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विभाजन की त्रासदी पर ‘तमस’ जैसा कालजयी उपन्यास लिखने वाले भीष्म साहनी प्रेमचंद की परंपरा के साहित्यकार हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी भीष्म साहनी ने कथा साहित्य के अलावा नाटक, जीवनी, अनुवाद और बाल साहित्य में भी महत्वपूर्ण योगदान किया। भीष्म साहनी का संपूर्ण लेखन आज के समय के यथार्थ के प्रमुख द्वंद्वों को सामने लाता है और प्रेमचंद ने जिसे साहित्य की कसौटी माना था, उस पर पूरी तरह खरा उतरता है।

प्रेमचंद ने लिखा था – “हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो, जो हममें गति और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं, क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।“ देश की आजादी के बाद जिन लेखकों ने युगीन यथार्थ और उसकी चुनौतियों को अपनी रचनाओं में सामने रखा, भीष्म साहनी उनमें प्रमुख हैं। भीष्म साहनी उन प्रगतिशील लेखकों में अग्रणी हैं, जिन्होंने अपने साहित्य में आम जन के जीवन और उसके संघर्षों को स्वर दिया।

अपने विपुल और बहुआयामी लेखन से भीष्म साहनी ने न केवल हिंदी, बल्कि विश्व साहित्य को समृद्ध किया है। भीष्म साहनी के लेखन का फलक काफी विस्तृत है। इसे उनकी कहानियों, उपन्यासों और नाटकों को पढ़कर आसानी से महसूस किया जा सकता है। उत्पीड़ित, शोषित और वंचित वर्ग की मुक्ति की आकांक्षा उनके लेखन का मूल स्वर है। अपनी रचनाओं में उन्होंने जहां शोषण और दमन पर आधारित समाज के कड़वे यथार्थ को परत-दर-परत उजागर किया है, वहीं शोषणमुक्त और स्वतंत्र समाज के निर्माण का चिर स्वप्न भी वहां संचित है। भीष्म साहनी ने स्वयं विभाजन के दर्द को झेला और महसूस किया था।

 भारत में ब्रिटिश राज की कुटिल नीतियों को समझने के साथ  ही उन्होंने यह महसूस कर लिया था कि वास्तविक आजादी तभी मिल सकती है, जब सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में बुनियादी बदलाव हो। वे आजाद भारत के शासकों के छल-छद्म को भी भली-भांति समझते थे और जनसंघर्षों की दशा और दिशा को भी। आजादी के बाद महानगरों और शहरों में उभरने वाले मध्यवर्ग की औपनिवेशिक मानसिकता और संवेदनहीनता को भी उन्होंने देखा और महसूस किया था, तभी वे उन अमानवीय और विडंबनापूर्ण परिस्थितियों का चित्रण कर सके, जो उनकी कहानियों में दिखाई पड़ती हैं। ‘चीफ़ की दावत’, ‘वांड़्चू’, ‘ओ हरामजादे!’, ‘रामचंदानी’, ‘शोभायात्रा’, ‘मेड इन इटली’, ‘लीला नंदलाल की’, ‘गंगो का जाया’, ‘चीलें’ और न जाने कितनी कहानियों में यही कड़वा सच सामने आया है। सांप्रदायिक दंगों और उनकी त्रासदी, जिसका प्रत्यक्ष अनुभव उन्होंने किया था, ‘अमृतसर आ गया है’ जैसी कहानियों में उभर कर सामने आई है।

सांप्रदायिकता के सवाल पर उन्होंने ‘कबिरा खड़ा बाज़ार में’ जैसा नाटक लिखा। भूलना नहीं होगा कि आज सांप्रदायिकता का सवाल भारतीय राजनीति के केंद्र में आ गया है और ऐसे हालात बनते जा रहे हैं, जिसमें आम आदमी घुटन, संत्रास और वंचना में जीने को मजबूर है। ऐसे में, भीष्म साहनी का साहित्य बहुत ही प्रासंगिक हो गया है।

भीष्म साहनी का जन्म 8 अगस्त, 1915 को रावलपिंडी में एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। वह अपने पिता हरबंस लाल साहनी तथा माता लक्ष्मी देवी की सातवीं संतान थे। 1935 में लाहौर के गवर्नमेंट कालेज से अंग्रेजी में एम.ए. करने के बाद पारिवारिक व्यवसाय संभालने के साथ ही वे एक कॉलेज में अवैतनिक प्राध्यापक भी हो गए।

थिएटर में रुचि होने के कारण वे भारतीय जननाट्य संघ (इप्टा) से जुड़कर काम करने लगे। उनके बड़े भाई प्रसिद्ध अभिनेता बलराज साहनी भी इप्टा से जुड़े थे। भीष्म साहनी ने विद्यार्थी जीवन से ही लिखना शुरू कर दिया था। उनकी पहली कहानी अबला इंटर कालेज की पत्रिका रावी में तथा दूसरी कहानी नीली आंखें अमृतराय के सम्पादकत्व में हंस में छपी। आजादी के बाद उनका परिवार भारत आ गया था। यहां इप्टा के साथ वे प्रगतिशील लेखक संघ और अफ्रो-एशियाई लेखक संघ से जुड़े। आगे चल कर वे अफ्रो-एशियाई लेखक संघ के महासिचव भी बने।

भीष्म साहनी ने विदेशी भाषा प्रकाशन गृह, मॉस्को, सोवियत संघ में अनुवादक के रूप में 1957 से 1963 तक काम किया। इसके बाद भारत लौटने पर उन्होंने ऐतिहासिक दिल्ली कॉलेज में लंबे समय तक प्राध्यापन किया।  1965 से 1967 तक उन्होंने ‘नई कहानियां’ का संपादन भी किया।

उनकी प्रमुख कृतियां हैं – तमस, झरोखे, कड़ियां, बंसती, मैय्यादास की माड़ी, नीलू नीलिमा नीलोफर (उपन्यास), भटकती राख, भाग्यरेखा, पहला पाठ, पटरियां, वाड़्चू, प्रतिनिधि कहानियां (कहानी संग्रह), हानूश, कबिरा खड़ा बाजार में, माधवी, मुआवजे (नाटक)। इसके अलावा उन्होंने ‘मेरे भाई बलराज’, ‘अपनी बात’, ‘मेरे साक्षात्कार’ किताबें लिखीं। दुनिया के प्राय: सभी बड़े साहित्यकारों ने बच्चों के लिए जरूर लिखा है। भीष्म साहनी ने भी बच्चों के लिए वापसी और गुलेल का खेल जैसी किताबें लिखीं।

11 जुलाई, 2003 को अपनी मृत्यु से कुछ दिन पहले उन्होंने आज के अतीत नाम से आत्मकथा का प्रकाशन भी करवाया। 1986 में उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘तमस’ पर टेलीविजन सीरियल बना, जिसमें उन्होंने खुद अभिनय भी किया था। उन्होंने कुछ फिल्मों में भी अभिनय किया, जिनमें ‘मोहन जोशी हाज़िर हो’ प्रमुख है। भीष्म साहनी को 1975 में ‘तमस’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। 1980 में उन्हें अफ्रो-एशियाई लेखक संघ का लोटस अवॉर्ड मिला।1983 में उन्हें सोवियत लैंड नेहरू अवॉर्ड और 1998 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।

भीष्म साहनी गहन मानवीय संवेदना से भरपूर साहित्यकार थे। वे बहुत ही विनम्र और मृदुभाषी थे। नए लेखकों से बहुत ही प्रेम और उत्साह से मिला करते थे और हर संभव उनका सहयोग करते थे। भीष्म साहनी की सबसे बड़ी खासियत थी कि उन्होंने जैसा जीवन जिया, जिन संघर्षों को झेला, उसी का चित्रण किया। उनके लिए रचना कर्म और जीवन में कोई भेद नहीं था। भीष्म साहनी हमेशा शोषणविहीन समतावादी समाज की स्थापना के लिए संघर्ष के प्रति समर्पित और प्रतिबद्ध रहे और उनका रचना कर्म भी इसी उद्देश्य से प्रेरित रहा।

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