Sunday, 2 August 2015

F-DAY SPECIAL : अच्छे मित्र बाजार में नहीं बिकते


 - वीणा भाटिया




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-    वीणा भाटिया
दो अक्षर के इस शब्‍द मित्र का मर्म जितना गहरा है, कर्म उतना ही कठिन है। जीवन यात्रा में हम आए दिन सैकड़ों लोगों से मिलते हैं और अब तो फेसबुक हमें हजारों दोस्‍तों के संपर्क में ला रहा है। उनसे हमारे संबंध विभिन्‍न स्‍तरों पर बनते हैं और बिगड़ते भी हैं। अपरिचित भी परिचित बन जाते हैं और कभी-कभी वक्‍त का तकाजा कहिए या परिस्थितियों का चक्‍कर कि परिचित भी अपरिचित-से लगने लगते हैं। संपर्क में आए सभी लोगों से हमारी एक-सी ही आत्‍मीयता, घनिष्‍ठता या मित्रता नहीं होती, यह संभव भी नहीं है।
       कई लोग मित्र बनाने में बहुत जल्‍दबाजी से काम लेते हैं। उनका परिचय तुरंत मित्रता में बदल जाता है और वे इसे अपनी विशेषता मानते हैं, लोकप्रियता मानते हैं। हो सकता है कि जल्‍दीबाजी में हुई आपकी इस घनिष्‍ठता ने आपको एक सच्‍चा मित्र दे दिया हो, पर यह अपवाद भी हो सकता है। और अपवादों से जीवन नहीं जिया जाता। ऐसा भी हो सकता है कि जल्दीबाजी में हुई आपकी मित्रता का सूत्र ढीला हो और बुनियाद खोखली। बाद में आपको लगे कि आप मित्र बनाने की कला में पारंगत नहीं हैं और धोखा खा गए। सच्‍चा मित्र पा लेने का मतलब जिंदगी की जंग जीत लेने जैसा ही होता है। कभी-कभी किसी के प्रति मन चुंबक की भांति आकर्षित होता है। जिस व्‍यक्ति को आप मित्र बनाना चाहते हैं, वह भी आपका मित्र बनने का उत्‍सुक होता है। कभी-कभी अपना मन भी साक्षी दे देता है और इंट्यूशन काम कर जाता है। कई बार ऐसा भी होता है कि आप स्‍वयं कितने ही अच्छे मित्र क्‍यों न हों, पर यदि आपका मित्र आपके प्रति निश्‍छल नहीं है तो आपका सारा प्रयास बालू में तेल निकालने के समान व्‍यर्थ साबित हो जाता है। अच्‍छा और सच्‍चा मित्र बनाने के इस गंभीर मसले को बड़ी गहराई और विवेक से हल करें। दूरदर्शिता और पैनी दृष्टि का सहारा लेकर यह मापने का प्रयत्‍न करें कि अमुक व्‍यक्ति की मित्रता आपके हक में ठीक है भी या नहीं? आपके मित्र आपके व्‍यक्तित्‍व के परिचायक होते हैं। आप कैसे लोगों से मिलते हैं, आपकी मित्रता कैसे लोगों से है, इससे लोग अंदाजा लगा लेते हैं कि आप स्‍वयं किस प्रकार के व्‍यक्ति हैं। कहते है मित्रविहीन मनुष्‍य के लिए अपनी कठिनाइयों पर विजय पाना बहुत मुश्किल होता है। इसलिए एक अच्‍छे मित्र का होना आवश्‍यक है, पर एक बुरे मित्र से मित्र का न होना ही बेहतर है, क्‍योंकि मित्र की अच्छी या बुरी संगति का असर पड़े बिना नहीं रह सकता।

      कई बार किसी अच्‍छे मित्र का नाम लेकर लोग मिसालें दिया करते हैं-दोस्‍त हो तो ऐसा, देखो भई दोस्‍ती इसे कहते हैं आदि-आदि। अच्‍छे मित्र के विशेष गुणों की व्‍याख्‍या से हमारे शास्‍त्र, वेद और पुराण भरे पड़े हैं। सज्‍जन लोगों ने अच्‍छे मित्रों के लक्षण बताते हुए कहा है कि एक अच्‍छा मित्र अपने मित्र के गुणों को प्रकाश में लाने का प्रयास करता है। एक अच्‍छा मित्र अपने मित्र को उसकी अच्‍छाइयों और बुराइयों के साथ अपनाता है। अच्‍छे मित्र पैदा नहीं होते, बनाए जाते हैं। मित्रता की बेल को सहयोग और सद्भावना से सींचते रहना पड़ता है। सबसे बड़ी बात है कि दो मित्रों का एक-दूसरे पर विश्‍वास हो और संवेदनशील दृष्टिकोण हो। एक सच्‍चा मित्र प्रतिशोध और प्रतिस्पर्द्धा की भावना कभी नहीं रखेगा। मित्र की सफलताएं उसके मन में ईर्ष्‍या और विद्वेष उत्‍पन्‍न नहीं करेंगी, बल्कि वह उन सफलताओं को अपनी सफलता मान कर स्‍वयं गौरवान्वित महसूस करेगा।

     एक अच्‍छा मित्र बनने के लिए बहुत जरूरी है अपने बड़प्‍पन, मान-सम्‍मान और धन-दौलत के सामने मित्र को कदापि छोटा नहीं महसूस होने देना। कृष्‍ण और सुदामा की मित्रता कुछ इसी संदर्भ में याद की जाती है। गलती इंसान से ही होती है, आपके मित्र से भी हो सकती है। हर छोटी-मोटी गलती को मुद्दा न बनाएं। कब मौन रह जाना है, कब कितना कहना है और कैसे कहना है, यदि आप जानते हैं तो आपकी यह खूबी आपकी मित्रता को रसमय बनाए रखेगी।

    मित्रता को 'टेकेन फार ग्रांटेड' जानकर मित्र की हर बात में इतनी दखलंदाजी न करें कि वह आपसे बोर हो जाए। हर संबंध की एक सीमा होती है, चाहे वह संबंध रिश्‍तेदारी का हो या मित्रता का। आपकी समझदारी और दूरदर्शिता इसी में है कि आप सीमाओं का उल्‍लंघन न करें। तभी आपकी मित्रता स्थिरता, प्रौढ़ता और  परिपक्‍वता पा सकेगी। कहीं ऐसा न हो कि आपकी नादानी से एक अच्‍छा मित्र बनने से रह जाए या सच्‍चा मित्र पाकर भी आप उसे खो दें। जरूरी नहीं कि दो मित्रों की रुचि या उनके सभी शौक एक से हों। आपमें कई बातों पर मतभेद हो सकते हैं, तकरार भी हो सकती है, पर यदि आपमें पारस्‍परिक अंतरंगता, एक-दूसरे के प्रति निष्‍ठा और स्‍नेह है, तो कुछ क्षणों के लिए भले ही लगे कि मित्रता की ग्रंथि कहीं लचक कर कट-सी गई, पर यह कसैला तनाव अधिक देर तक नहीं ठहर सकेगा और आपके व्‍यवहार में सहजता आ जाएगी।

   अच्‍छे मित्र बाजार में नहीं बिकते कि आप मुंहमांगा दाम देकर दुकानदार से उसके अच्‍छे-बुरे की पूछताछ और मोलभाव करके उसे खरीद कर ला सकें। अच्‍छा‍ मित्र बड़ी मुश्किल से मिलता है। और जब मिलता है तो वरदान की भांति मिलता है। उसकी महानता के आगे सब कुछ फीका लगता है। सच्‍ची मित्रता ऊंच-नीच, जात-पात, धनी-निर्धन और छोटे-बड़े के भेदभाव की परिधि से बाहर की चीज है। अंत में इतना ही  
     चिलचिलाती धूप में
         नीम का पेड़ हैं अच्‍छे दोस्‍त
         हाथ फैलाकर मांगी
         कितनी दुआओं का फल हैं
         अच्‍छे दोस्‍त।



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Thursday, 30 July 2015

प्रेमचंद की प्रासंगिकता

31 जुलाई, जन्मदिवस पर


- वीणा भाटिया 


http://www.haribhoomi.com/news/literature/old-rice/premchand-birthday/28773.html

प्रेमचंद ने कहा था कि साहित्य राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं, बल्कि राजनीति के आगे मशाल दिखाते हुए चलने वाली सच्चाई है। साहित्य का क्षेत्र संपूर्ण जीवन है। वह जीवन को उसकी समग्रता में ग्रहण करता है और एक सामाजिक इकाई के रूप में व्यक्ति के जीवन और सामाजिक यथार्थ के जटिल व बहुआयामी स्वरूप को उद्घाटित करता है। साहित्य जीवन की पुनर्रचना है और इस पुनर्रचना में उसकी आलोचना निहित होती है। यही कारण है कि प्रेमचंद ने साहित्य को जीवन की आलोचना बताया था।
 
प्रेमचंद का संपूर्ण साहित्य इस कसौटी पर खरा उतरता है। यही कारण है कि प्रेमचंद के साहित्य की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है। आज भी प्रेमचंद का साहित्य सबसे ज्यादा पढ़ा जाता है। देश ही नहीं, विदेशों में भी प्रेमचंद के पाठकों की कोई कमी नहीं है। प्रेमचंद के साहित्य की लोकप्रियता का प्रमाण है साल-दर-साल उनकी किताबों के नए संस्करणों का प्रकाशन।


अब तो प्रेमचंद की किताबों पर से कॉपीराइट समाप्त हो जाने से बहुतेरे प्रकाशक उनकी किताबों के सस्ते संस्करण प्रकाशित कर रहे हैं। यही नहीं, प्रेमचंद की रचनाओं के अनुवाद लगभग सभी भारतीय भाषाओं में होने से हर पढ़ा-लिखा भारतवासी उनके नाम से परिचित है। स्कूल-कॉलेजों के सिलेबस में उनकी रचनाएं लगी होने से देश का बच्चा-बच्चा उनका नाम जानता है। दुनिया की लगभग सभी प्रमुख भाषाओं में प्रेमचंद की कृतियों के अनुवाद उपलब्ध हैं।

प्रेमचंद आधुनिक भारत के प्रतिनिधि लेखक हैं। उनका लेखन बहुआयामी है। संक्षेप में कहें तो उनके लेखन में ‘भारत की आत्मा’ की अभिव्यक्ति हुई है। अपनी रचनाओं में प्रेमचंद अपने समय के मूलभूत सवालों से दो-चार होते हैं। युगीन यथार्थ को वे उसकी संपूर्णता में उद्घाटित करते हैं। प्रेमचंद की कहानियों और उपन्यासों में समग्र और जटिल जीवन स्थितियों का चित्रण हुआ है। सभी पात्र वास्तविक और जीवंत हैं। कहीं भी कुछ आरोपित और गढ़ा हुआ नहीं है। फिर किस्सागोई की शैली ऐसी कि पाठक एक बार पढ़ना शुरू कर दे तो कहीं ऊब नहीं सकता। यह है प्रेमचंद की खासियत जो उन्हें विशिष्ट ही नहीं, कालजयी रचनाकार बनाती है।



प्रेमचंद ने लेखन की शुरुआत ऊर्दू में की। उनकी कहानियां मुंशी दयाराय निगम की पत्रिका ‘ज़माना’ में प्रकाशित होती थीं। पर जब उनकी कहानियों का पहला संग्रह ‘सोज़े वतन’ के नाम से आया तो औपनिवेशिक सरकार को इससे खतरा महसूस हुआ। प्रेमचंद सरकारी नौकरी में थे। जिला के हाकिम ने उन्हें बुलाकर लिखना बंद करने को कहा। ‘सोज़े वतन’ की सारी उपलब्ध प्रतियां जला दी गईं। उस समय वे नवाब राय नाम से लिखते थे। यह उनका वास्तिवक नाम था। पर लेखन पर सरकारी पाबंदी लग जाने के बाद मुंशी दयाराय निगम की सलाह पर उन्होंने नया नाम प्रेमचंद अपनाया और लिखना जारी रखा।

‘सोज़े वतन’ यानी देश का दर्द में एक कहानी है ‘दुनिया का अनमोल रतन’। इस कहानी का एक किरदार कहता है – ‘ख़ून का वो आख़िरी क़तरा जो वतन की हिफ़ाजत में गिरे दुनिया का अनमोल रतन है।‘ इसी पंक्ति से अंग्रेजों को खतरे की बू आई थी। लेकिन प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं के माध्यम से देश और देशवासियों के दर्द को सामने लाना जारी रखा।


उनके समग्र साहित्य में औपनिवेशिक और सामंती उत्पीड़न से त्रस्त ग्रामीण भारत का दुख-दर्द सामने आया है। उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति ‘गोदान’ भारतीय किसान के त्रासदीपूर्ण जीवन की महागाथा है। कर्ज में डूबे जिस भारतीय किसान के जीवन की जैसी विडंबनाएं वे सामने लाते हैं, आजादी के इतने वर्ष गुजर जाने के बाद भी वे परिस्थितियां खत्म नहीं हुई हैं, बल्कि बदले हुए रूपों में और भी उग्र होकर सामने आई है। प्रेमचंद का किसान कर्ज में डूबा होने पर भी आखिरी दम तक संघर्ष करता रहता है, पर आज तो स्थितियां इतनी विकराल हो गई हैं कि किसान कर्ज में डूबकर आत्महत्या कर रहे हैं और वो भी लाखों की संख्या में। इसी तरह, अपने उपन्यास ‘रंगभूमि’ में प्रेमचंद ने उद्योग स्थापित करने के लिए किसानों की जमीन छीनने, उनके विस्थापन और इसके विरोध में एक मामूली आदमी सूरदास के संघर्ष की कहानी लिखी। सूरदास आखिरी दम तक अपनी जमीन से कब्जा नहीं छोड़ता और संघर्षरत रहता है। आज सरकार द्वारा किसानों की जमीन का अधिग्रहण राजनीति का बड़ा मुद्दा बना हुआ है।

समझा जा सकता है कि प्रेमचंद ने अपनी गहरी अंतर्दृष्टि से आने वाले समय को समझ लिया था। उनका एक और महत्वपूर्ण उपन्यास ‘प्रेमाश्रम’ भी किसानों की जिंदगी और व्यापक सामाजिक बदलाव से जुड़े सवालों को उठाता है। प्रेमचंद ने भारतीय समाज की जातिवादी व्यवस्था के घृणित रूप को भलीभांति समझा था। तभी उन्होंने ‘कफन’ और ‘सद्गति’ जैसी कालजयी कहानियां लिखीं।

प्रेमचंद का संपूर्ण साहित्य उस दौर में लिखा गया जब औपनिवेशिक गुलामी से मुक्ति के लिए देश में व्यापक संघर्ष चल रहा था। इस संघर्ष से प्रेमचंद इस हद तक जुड़े थे कि महात्मा गांधी ने जब असहयोग आंदोलन शुरू किया तो उनके आह्वान पर उन्होंने अंग्रेजी सरकार की नौकरी छोड़ दी। उन्होंने ‘हंस’ मासिक और  ‘जागरण’ पाक्षिक का प्रकाशन शुरू किया। प्रेमचंद यह बात समझ चुके थे कि अंग्रेजों के भारत छोड़कर चले जाने से देश की समस्याएं नहीं सुलझेंगी। उन्होंने समाज व्यवस्था के सवाल को उठाया था। उनका मानना था कि राजनीतिक स्वाधीनता से कुछ नहीं हो सकता, जब तक सामाजिक और आर्थिक स्वाधीनता की स्थापना नहीं होती। उन्होंने साफ कहा था कि केवल जॉन की जगह गोविंद को बिठा देने से कुछ नहीं होने वाला, जब तक शोषण पर आधारित सामाजिक व्यवस्था में मूलभूत बदलाव नहीं होता।

उनके लिए सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में बदलाव का सवाल सबसे महत्वपूर्ण था। ठीक यही बात भगत सिंह ने भी कही थी कि गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेजों के सत्ता में आ जाने से कुछ होने वाला नहीं। प्रेमचंद खुद को कलम का मजदूर मानते थे। उनका कहना था कि जिस दिन वे न लिखें, उन्हें रोटी खाने का अधिकार नहीं है। प्रेमचंद अपने जीवन के आखिरी दिन तक लिखते रहे।

1936 में जब प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई तो उन्हें उसकी अध्यक्षता करने के लिए आमंत्रित किया गया। उस सम्मेलन में प्रेमचंद ने जो भाषण दिया, वह आधुनिक साहित्य का घोषणापत्र बन गया।

उन्होंने कहा, ‘’साहित्य का काम केवल मन बहलाव का सामान जुटाना नहीं है। हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो, जो हममें गति और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं, क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।”


     
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Friday, 24 July 2015

हीरा मंडी लाहौर की एक शाम




                                          - जगतार


शाम की अज़ान हुई
कर इबादत ख़ादिमों ने
खिड़कियों में लटकते हैं
पंछियों के पिंजले
खिड़कियों के बाहर जग गई 
लालिमामय बत्तियां
शीशों के आगे तने हुए बदन
कर रहे आयु छिपाने के यत्न
सारंगी के सुर ने बिस्मिल्ला कही
जाग उठी शाम के होते ही हर गली।

मुंगेर और मोतियों की
खुश्बू गलियों में चली
पांचों वक़्त के नमाज़ी 
शराअ के पाबंद लोग
मुंह छिपा के चढ़ रहे हैं
सीढ़ियां बे-रोक टोक।
कह रहे हैं सुर सलाम

हो रहे हैं तमाशाई के जज़्बे बे-लगाम
सरक आए नतृकियों के उफनते उन्माद में 
धीरे-धीरे रंग, सुर, नख़रे तमाम
सूखाग्रस्त जिंदगी पर हो रही चांदी की बारिश
चोलियों की हर तनी के अंदर तनाव है
सीने के भीतर भी अजब उतार-चढ़ाव है
सुर में है हर एक बदन
पर बुझे हुए हैं मन

ठुमरियों के स्वरों पर
है दाग पीक-ए-पान के
झांझरों पर पड़ गए सुर्ख निशान
छप गए पैरों पे होंठ
इस तरह लगता है कि विलाप करती है सारंगी
थक गए चल-चल के जाम।
हो गई पागल शराब
लड़खड़ाती सीढ़ियों से
उतरती हुई थकान
भूल चुकी है आदाब

पलटते कदमों के नीचे फूल हैं मसले पड़े।
एक गली के किनारे 
हो रही गाली-गलौच
मुंह छिपा कर मोहतबर और पाक लोग
लड़खड़ाते पैर अपने 
रख रहे हैं सोच-सोच।

हर किसी दीए के अंदर 
नींद है पसरी हुई
फड़फड़ा रही है ज़ख्मी
पंछियों की तरह लौ
जिस्म की दुर्गंध लड़ने लग पड़ी है
ऊपरी खुशबुओं के साथ
खिड़कियों में बुझ रहे हैं 
धीरे-धीरे सब चिराग़
रात के अंधेरे में छिपते जा रहे हैं
मोहतबर लोगों के दाग।


Tuesday, 21 July 2015

कुमार पाशी की नज़्म - सौगंधी

दुनिया में वेश्यावृत्ति को सबसे पुराना धंधा माना गया है। सभ्यता के विकास के साथ यह घृणित धंधा बढ़ता ही चला गया। वेश्याओं के दुखी और विडंबनापूर्ण जीवन पर विश्व साहित्य में एक से एक कृतियां सामने आई हैं। उर्दू के मशहूर अफ़सानानिगार मंटो ने कई कहानियां इनके जीवन पर लिखी हैं। उनकी एक कहानी है - हतक। जब यह कहानी छपी तो इसने सामान्य पाठकों से लेकर मशहूर शाइरों-अदीबों के दिलों को झकझोर डाला। इस कहानी के किरदार सौगंधी पर कई शाइरों ने नज़्में लिखीं। पेश है कुमार पाशी की नज्म।




इक मौसम मेरे दिल के अंदर
इक मौसम मेरे बाहर
इक रस्ता मेरे पीछे भागे
इक रस्ता मेरे आगे
बीच में चुपचाप खड़ी हूं, जैसे
बूझी हुई बुझारत
किसको दोष दूं : जाने मुझको
किसने किया अकारत

आईना देखूं, बाल सवारूं, लब पर हंसी सजाऊं
गला सड़ा वही गोश्त कि जिस पर
सादे रंग चढ़ाऊं
जाने कितनी बर्फ़ पिघल गई - बह गया कितना पानी
किस दरिया में ढूंढू बचपन
किस दरिया में जवानी

रात आए : मेरी हड्डियां जागें
दिन जागे : मैं सोऊं
अपने उजाड़ बदन से लग कर
कभी हंसूं, कभी रोऊं
एक भयानक सपना : आग में लिपटी जलती जाऊं
चोली में उड़से सिक्कों के संग पिघलती जाऊं


इक मौसम मेरे दिल के अंदर
इक मौसम मेरे बाहर
इक रस्ता मेरे पीछे भागे
इक रस्ता मेरे आगे
रस्ते बीच मैं खड़ी अकेली
पिया न संग सहेली
क्या जाने मुझ जनमजली ने क्या अपराध किया है
आखिर क्यों दुनिया का मैंने सारा ज़हर पिया है
मेरे साथ ज़माने
तूने अच्छा नहीं किया है

दूर खड़े मेरे आंगन द्वारे
पल पल पास बुलाएं
कहो हवाओं से अब - उनको दूर
बहुत ही दूर कहीं ले जाएं
झूट की यह तारों दीवारें
झूट की यह फ़र्श और छत है
झूट का बिस्तर, झूट के साथी
झूट की हर संगत है
झूट बिछाऊं, झूट लपेटूं
झूट उतारूं, पहनूं
झूट पहन कर जिस्म के वीराने में दौड़ती जाऊं
क्यों नहीं ज़हन की दीवारों से टकराऊं, मर जाऊं

शमा सरीखी पिघल रही हूं
ओझल कभी उजागर
इक मंज़र मेरे दिल के अंदर
इक मंज़र मेरे बाहर
मुझको ढूंढने कौन आए अब इन तनहा राहों पर
बोटी-बोटी कट गई मेरी रौशन चौराहों पर

अब गहरे सन्नाटे में किसको आवाज़ लगाऊं
कौन आएगा मदद को मेरी
क्या चीखूं, चिल्लाऊं
अपने गोश्त की मैली चादर
ओढ़ के चुप सो जाऊं
और अचानक नींदों के दलदल में गुम हो जाऊं
खुद को खुद में ढूंढने निकलूं
लेकिन कहीं न पाऊं...

Friday, 10 July 2015

सवाल खड़े करने हैं : चेखव

-  वीणा भाटिया



विश्वविख्यात रूसी कथाकार और नाटककार अंतोन पाव्लोविच चेखव का जन्म दक्षिण रूस के तगानरोग में 29 जनवरी, 1960 को हुआ था। उन्होंने कथा साहित्य में एक नए युग की ही शुरुआत की थी। वह यथार्थवादी रचनाकार थे। चेखव पेशे से डॉक्टर थे। साहित्य रचना के साथ-साथ डॉक्टरी का पेशा उन्होंने कभी नहीं छोड़ा। एक बार उन्होंने मजाक में कहा था - मेडिसिन मेरी लॉफुल वाइफ है और लिटरेचर मिस्ट्रेस।

चेखव ने परंपरागत कहानियों में आने वाले नैतिकतावादी आग्रहों को अस्वीकार कर दिया। उनका कहना था कि एक आर्टिस्ट का काम सवाल खड़े करना है, न कि उनका जवाब देना। चेखव के नाटक 'द सैगल', 'अंकल वान्या' और 'थ्री सिस्टर्स' विश्वप्रसिद्ध हैं। चेखव अपने नाटकों के मंचन में बहुत रुचि लेते थे और उनके रिहर्सल के दौरान खुद मौजूद रहते थे।

चेखव के समय में रूसी समाज भीषण उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा था। इस दौर में नया उभरता मध्यवर्ग नवीन आशाओं और आकांक्षाओं का वाहक था, पर उसके जीवन में भी विडम्बनाएं कम नहीं थीं। इसी मध्यवर्ग के जीवन की सच्चाइयों को सामने लाने का काम चेखव ने बहुत ही संवेदनशीलता के साथ किया।   

1879 में चेखव ने मॉस्को स्टेट मेडिकल यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। 1884 में उन्होंने मेडिकल परीक्षा पास कर ली और बतौर फिजिशियन काम शुरू किया। अगले ही साल चेखव बीमार पड़ गए। उन्हें लाइलाज बीमारी तपेदिक हो गई। लेकिन वे लगातार लिखते रहे। 1886 में उन्हें सेंट पीटर्सबर्ग के मशहूर अखबार 'नोवोया रेम्या' के लिए लिखने का आमंत्रण मिला। इसके अरबपति मालिक एलेक्सी सुवोरिन ने उन्हें उस समय के हिसाब से दोगुना पारिश्रमिक दिया। वे चेखव के आजीवन अभिन्न मित्र बने रहे। उसी दौरान रूस के बड़े साहित्यकारों के बीच उनकी पहचान बनी। 1887 में चेखव को प्रतिष्ठित पुश्किन प्राइज मिला। चेखव बहुत ज्यादा लिखते थे। कहा जाता है कि वे अपनी स्क्रिप्ट दोबारा नहीं पढ़ते थे।

चेखव अपने जीवनकाल में ही काफी प्रसिद्ध हो चुके थे। रूस के तमाम बड़े लेखकों के साथ उनके प्रगाढ़ संबंध थे। टॉल्सटाय और गोर्की जैसे लेखक उनका काफी सम्मान करते थे। बीमारी के बावजूद चेखव कठिन परिश्रम करते थे। वे लगातार लेखन और अपने नाटकों के मंचन के सिलसिले में व्यस्त रहते थे। उनकी बीमारी धीरे-धीरे बढ़ती ही जा रही थी। 15 जुलाई, 1904 को महज 44 साल की उम्र में इस महान लेखक का निधन हो गया।


जेम्स ज्वॉयस, वर्जिनिया वुल्फ, कैथरीन मैन्सफील्ड जैसे साहित्यकारों ने उनके लेखन के महत्त्व को रेखांकित किया। मशहूर नाटककार जॉर्ज बर्नाड शॉ ने उन्हें युग प्रवर्तक साहित्यकार बताया। अर्नेस्ट हेमिंग्वे ने उन्हें अद्वितीय नाटककार बताया। चेखव एक ऐसे मानवतावादी रचनाकार थे, जिन्होंने अपनी कृतियों में युगीन आकांक्षाओं को अभिव्यक्त किया। 

Wednesday, 3 June 2015

चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती

- त्रिलोचन शास्त्री



चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती
मैं जब पढ़ने लगता हूं वह आ जाती है
खड़ी खड़ी चुपचाप सुना करती है
उसे बड़ा अचरज होता है :
इन काले चिन्हों से कैसे ये सब स्वर
निकला करते हैं

चम्पा सुन्दर की लड़की है
सुन्दर ग्वाला है : गायें-भैंसे रखता है
चम्पा चौपायों के लेकर
चरवाही करने जाती है

चम्पा अच्छी है
चंचल है
नटखट भी है
कभी कभी ऊधम करती है
कभी कभी वह क़लम चुरा देती है
जैसे तैसे उसे ढूंढ कर जब लाता हूं
पाता हूं – अब क़ाग़ज गायब
परेशान फिर हो जाता हूं

चम्पा कहती है :
तुम कागद ही गोदा करते हो दिन भर
क्या यह काम बहुत अच्छा है
यह सुन कर मैं हंस देता हूं
फिर चम्पा चुप हो जाती है

उस दिन चम्पा आई, मैंने कहा कि
चम्पा, तुम भी पढ़ लो
हारे गाढ़े काम सरेगा
गांधी बाबा की इच्छा है –
सब जन पढ़ना-लिखना सीखें
चम्पा ने यह कहा कि
मैं तो नहीं पढ़ूंगी
तुम तो कहते थे गांधी बाबा अच्छे हैं
वे पढ़ने लिखने की कैसे बात कहेंगे
मैं तो नहीं पढ़ूंगी

मैंने कहा कि चम्पा, पढ़ लेना अच्छा है
ब्याह तुम्हारा होगा, तुम गौने जाओगी,
कुछ दिन बालम संग साथ रह चला जायगा जब कलकत्ता
बड़ी दूर है वह कलकत्ता
कैसे उसे संदेसा दोगी
कैसे उसके पत्र पढ़ोगी
चम्पा पढ़ लेना अच्छा है!

चम्पा बोली : तुम कितने झूठे हो, देखा,
हाय राम, तुम पढ़-लिख कर इतने झूठे हो
मैं तो ब्याह कभी न करूंगी
और कहीं जो ब्याह हो गया
तो मैं अपने बालम को संग साथ रखूंगी
कलकत्ता मैं कभी न जाने दूंगी
कलकत्ते पर बजर गिरे।


Wednesday, 27 May 2015

अरुणा शानबाग की मौत : क्या बदला 42 वर्षों में

-    वीणा भाटिया

कुछ ही दिनों पहले 62 साल की अरुणा रामचंद्र शानबाग की 42 वर्षों तक लगातार कोमा में रहने के बाद मृत्यु हो गई। ज़्यादातर लोग अरुणा शानबाग के बारे में नहीं जानते हैं। उनकी मौत के बाद मीडिया में आई ख़बरों के माध्यम से कुछ लोग उन्हें जानने लगे, पर जल्दी भूल भी जाएंगे। पर क्या अरुणा शानबाग को आसानी से भुलाया जा सकता है? और वो भी तब जब वो कोई असाधारण महिला नहीं थीं। पर अरुणा शानबाग के जीवन और उनकी मौत में कुछ तो असाधारणता है जिसने संवेदनशील लोगों, बुद्धिजीवियों और महिला अधिकार के लिए लड़ने वाले लोगों के दिलो-दिमाग में एक ज़ुम्बिश पैदा की है। एक हलचल-सी पैदा हुई है जो दिलों के सुकून पर भारी है। अरुणा की मौत ने एक बार फ़िर से उन सवालों को हमारे सामने जलते हुए अंगारों के रूप में सामने रख दिया है, जिनसे हम मुंह चुरा के बच नहीं सकते।

42 साल पहले मुंबई के केइएम अस्पताल में कार्यरत नर्स अरुणा के साथ अस्पताल के ही बेसमेंट में बर्बर बलात्कार हुआ था। वह उस समय 25 वर्ष की थीं और जल्दी ही उनकी शादी होने वाली थी। अरुणा के साथ बलात्कार अस्पताल के ही एक वार्ड ब्वॉय सोहन लाल ने किया था जो पहले से ही उन पर बुरी नज़र रखता था। बलात्कार किए जाने के पहले उसने अरुणा के गले में कुत्ते की चेन बांध दी थी, जिससे उनके मस्तिष्क में ऑक्सीजन का प्रवाह रुक गया और वह कोमा में चली गईं। सोहन लाल को गिरफ़्तार कर लिया गया, पर सबूतों के अभाव में उस पर बलात्कार का मुकदमा नहीं चल सका। कोमा में चली जाने के कारण अरुणा कोई बयान दे पाने में असमर्थ थीं। मेडिकल जांच में बलात्कार की पुष्टि नहीं हो सकी। पता नहीं, डॉक्टरों पर किस तरह का दबाव था। पर बाद में की गई मेडिकल जांच में अरुणा के साथ बलात्कार की पुष्टि हुई, पर अभियुक्त सोहन लाल पर सिर्फ़ हत्या के प्रयास और लूट का मामला दर्ज हुआ। उसने अरुणा की सोने की चेन और सगाई की अंगूठी छीन ली थी। सोहन लाल को महज़ सात साल की सजा हुई। और अरुणा शानबाग अगले 42 वर्षों तक जिंदा लाश बनी केइएम अस्पताल के वार्ड नंबर-4 में जीवन और मौत से अनभिज्ञ पड़ी रही। इन 42 वर्षों के दौरान केइएम अस्पताल की नर्सों ने अरुणा शानबाग की जो सेवा की, वह मेडिकल इतिहास में बेमिसाल है। उनकी मृत्यु के बाद वहां की नर्सों को एक अजीब-से खालीपन ने घेर लिया है। यद्यपि अरुणा शानबाग के कोमा में होने के कारण उनका अस्तित्व महज भौतिक रूप में ही था, पर इतना भी वहां की नर्सों को संबल प्रदान करता था और उनके अपने अस्तित्व को भी रेखांकित करता था। पर अब वहां एक खालीपन है। इसके साथ ही उनके अस्तित्व पर एक स्त्री होने की वजह से सवाल उसी रूप में है, जैसे 42 वर्ष पहले था। उनकी इज़्ज़त महफ़ूज नहीं है। उनकी सुरक्षा ख़तरे में है। पुरुष समाज में उनकी दोयम दर्जे की स्थिति बरक़रार है।

यह स्थिति निम्न वर्ग से लेकर तमाम वंचित वर्ग की स्त्रियों के साथ है। मध्य और उच्च वर्ग की महिलाओं के साथ बर्बर बलात्कार की वारदात कम ही होती हैं कुछ अपवादों के सिवा। यह अलग बात है कि यौन शोषण के मामले हर वर्ग और समुदाय की स्त्रियों के साथ कमोबेश होते ही हैं, पर निम्न और वंचित वर्ग की स्त्रियां बलात्कारियों की आसान शिकार होती हैं। स्त्रियों को अपना शिकार बनाने वाले भेड़िये तरह-तरह के रूप में घूमते नज़र आ जाते हैं। ये आवारागर्द तत्वों से लेकर दबंग अपराधी और अय्याश अमीरजादे तक होते हैं जिन्हें न कानून का भय होता है, न ही न्यायालय का, क्योंकि अपने अनुभवों और पूर्व उदाहरणों से ये भली-भांति समझ जाते हैं कि कानून उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता, अगर वे किसी भी तरह उसे अपने पक्ष में प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।

अरुणा शानबाग के मामले में कानून अपना काम कर पाने में असफल रहा। वह एक बर्बर अपराधी के पक्ष में झुक गया। ऐसा क्यों? इसलिए कि ऐसी लोमहर्षक घटना को किसी ने गंभीरता से नहीं लिया। न अस्पताल प्रशासन, न पुलिस और न ही न्यायालय ने इस मामले में संवेदनशीलता दिखाई। सबूत इकट्ठे नहीं किए गए। मेडिकल जांच में डॉक्टरों ने कोताही बरती, क्योंकि अरुणा एक सामान्य नर्स थी। दूर-दराज के किसी गांव से नौकरी करने मुंबई जैसे महानगर में आई थी। हज़ारों-लाखों ऐसी औरतें गांवों से पलायन कर रोज़ी-रोज़गार के लिए महानगरों में आती हैं। कौन उनकी इज़्ज़त की परवाह करता है! इतना ही नहीं, स्त्रियों की इज़्ज़त की जो गलत अवधारणा भारतीय मानस में गहराई से जड़ जमाये हुए है, वह भी बलात्कार की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए ज़िम्मेदार है। बलात्कार या यौन शोषण का मामला सामने आने पर परिवार के लोग उसे दबाना चाहते हैं। उनका मानना होता है कि मामला प्रकाश में आ जाने पर परिवार की बेइज़्ज़ती होगी। यही कारण है कि बलात्कार के अधिकांश मामलों में पुलिस में  रिपोर्ट होती ही नहीं। अरुणा शानबाग मामले में भी उसके होने वाले पति ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराए जाने का विरोध किया था। दूसरी तरफ, पुलिस में मामला दर्ज कराए जाने के बावजूद न्यायिक प्रक्रिया की विसंगतियों के कारण शायद ही पीड़िताओं को न्याय मिल पाता है।

अरुणा शानबाग का मामला बहुत ही पुराना है। इस मामले को लेकर ऐच्छिक मृत्यु को न्यायालय से वैधता मिली, ये अलग बात है कि अरुणा शानबाग की सेवा में लगी नर्सों ने इसे उन पर लागू किए जाने से इनकार कर दिया। बहरहाल, बलात्कार की शिकार स्त्री किस तरह एक जिंदा लाश बन जाती है, यह साफ दिखाई पड़ा अरुणा के 42 साल तक कोमा में रहने के दौरान, यद्यपि उनकी जैसी देख-रेख केइएम अस्पताल की नर्सों ने की, वह भी एक मिसाल ही है।

भारतीय समाज और संस्कृति में बलात्कार की जड़ें बहुत ही गहरी हैं। अभिजात वर्ग बलात्कार को अपना परमाधिकार समझता रहा है। सामंती समाज से लेकर आज के संक्रमणशील दौर में बलात्कार स्त्रियों पर अत्याचार का औज़ार बना हुआ है। बलात्कार की हर घटना के बाद जब इसका बड़े पैमाने पर विरोध होता है तो लगता है कि इस प्रवृत्ति पर कुछ लगाम लगेगी। लेकिन बलात्कार के मामलों पर कानून सख्त किए जाने की जितनी बात होती है, बलात्कार की घटनाएं और भी बढ़-चढ़ कर सामने आने लगती हैं, मानो बलात्कारी कानून और शासन व्यवस्था को खुलेआम चुनौती देना चाहते हों। 2012 में दिल्ली निर्भया गैंगरेप की घटना के बाद बलात्कार संबंधी कानूनों की पुनर्समीक्षा की गई और इस संबंध में नए सिरे से कानूनों को परिभाषित किया गया। लेकिन कानून के भय से बलात्कार की घटनाओं में कोई कमी नहीं आई, बल्कि ये घटनाएं बढ़ी ही हैं। आंकड़े इसके गवाह हैं।

इससे स्पष्ट होता है कि बलात्कार की समस्या कानून-व्यवस्था से जुड़ी समस्या नहीं है, बल्कि यह समाज व्यवस्था से जुड़ी समस्या है। अमीरी-गरीबी और शोषण-दमन पर आधारित इस व्यवस्था में बलात्कार को मिटा पाना संभव नहीं है। पुरुष वर्चस्व और हर स्तर पर स्त्री उत्पीड़न शोषणमूलक व्यवस्था का अपरिहार्य गुणधर्म है। यह व्यवस्था हज़ारों वर्षों से बदस्तूर कायम है। कानूनी उपायों और सुधारवादी प्रयासों से बलात्कार और स्त्री उत्पीड़न के विविध रूपों को समाप्त नहीं किया जा सकता है।

स्त्री की वास्तविक आजादी एक समतावादी समाज में ही संभव है। शोषण पर आधारित सामाजिक व्यवस्था में स्त्री का स्थान दोयम दर्जे का है और रहेगा, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। यह ऐतिहासिक तथ्य है। स्त्री उत्पीड़न के रूप पूरी दुनिया में कमोबेश एक ही हैं। इसलिए स्त्री मुक्ति का संघर्ष सामाजिक व्यवस्था के बदलाव के संघर्ष से अलहदा नहीं हो सकता।