Tuesday, 21 July 2015

कुमार पाशी की नज़्म - सौगंधी

दुनिया में वेश्यावृत्ति को सबसे पुराना धंधा माना गया है। सभ्यता के विकास के साथ यह घृणित धंधा बढ़ता ही चला गया। वेश्याओं के दुखी और विडंबनापूर्ण जीवन पर विश्व साहित्य में एक से एक कृतियां सामने आई हैं। उर्दू के मशहूर अफ़सानानिगार मंटो ने कई कहानियां इनके जीवन पर लिखी हैं। उनकी एक कहानी है - हतक। जब यह कहानी छपी तो इसने सामान्य पाठकों से लेकर मशहूर शाइरों-अदीबों के दिलों को झकझोर डाला। इस कहानी के किरदार सौगंधी पर कई शाइरों ने नज़्में लिखीं। पेश है कुमार पाशी की नज्म।




इक मौसम मेरे दिल के अंदर
इक मौसम मेरे बाहर
इक रस्ता मेरे पीछे भागे
इक रस्ता मेरे आगे
बीच में चुपचाप खड़ी हूं, जैसे
बूझी हुई बुझारत
किसको दोष दूं : जाने मुझको
किसने किया अकारत

आईना देखूं, बाल सवारूं, लब पर हंसी सजाऊं
गला सड़ा वही गोश्त कि जिस पर
सादे रंग चढ़ाऊं
जाने कितनी बर्फ़ पिघल गई - बह गया कितना पानी
किस दरिया में ढूंढू बचपन
किस दरिया में जवानी

रात आए : मेरी हड्डियां जागें
दिन जागे : मैं सोऊं
अपने उजाड़ बदन से लग कर
कभी हंसूं, कभी रोऊं
एक भयानक सपना : आग में लिपटी जलती जाऊं
चोली में उड़से सिक्कों के संग पिघलती जाऊं


इक मौसम मेरे दिल के अंदर
इक मौसम मेरे बाहर
इक रस्ता मेरे पीछे भागे
इक रस्ता मेरे आगे
रस्ते बीच मैं खड़ी अकेली
पिया न संग सहेली
क्या जाने मुझ जनमजली ने क्या अपराध किया है
आखिर क्यों दुनिया का मैंने सारा ज़हर पिया है
मेरे साथ ज़माने
तूने अच्छा नहीं किया है

दूर खड़े मेरे आंगन द्वारे
पल पल पास बुलाएं
कहो हवाओं से अब - उनको दूर
बहुत ही दूर कहीं ले जाएं
झूट की यह तारों दीवारें
झूट की यह फ़र्श और छत है
झूट का बिस्तर, झूट के साथी
झूट की हर संगत है
झूट बिछाऊं, झूट लपेटूं
झूट उतारूं, पहनूं
झूट पहन कर जिस्म के वीराने में दौड़ती जाऊं
क्यों नहीं ज़हन की दीवारों से टकराऊं, मर जाऊं

शमा सरीखी पिघल रही हूं
ओझल कभी उजागर
इक मंज़र मेरे दिल के अंदर
इक मंज़र मेरे बाहर
मुझको ढूंढने कौन आए अब इन तनहा राहों पर
बोटी-बोटी कट गई मेरी रौशन चौराहों पर

अब गहरे सन्नाटे में किसको आवाज़ लगाऊं
कौन आएगा मदद को मेरी
क्या चीखूं, चिल्लाऊं
अपने गोश्त की मैली चादर
ओढ़ के चुप सो जाऊं
और अचानक नींदों के दलदल में गुम हो जाऊं
खुद को खुद में ढूंढने निकलूं
लेकिन कहीं न पाऊं...

Friday, 10 July 2015

सवाल खड़े करने हैं : चेखव

-  वीणा भाटिया



विश्वविख्यात रूसी कथाकार और नाटककार अंतोन पाव्लोविच चेखव का जन्म दक्षिण रूस के तगानरोग में 29 जनवरी, 1960 को हुआ था। उन्होंने कथा साहित्य में एक नए युग की ही शुरुआत की थी। वह यथार्थवादी रचनाकार थे। चेखव पेशे से डॉक्टर थे। साहित्य रचना के साथ-साथ डॉक्टरी का पेशा उन्होंने कभी नहीं छोड़ा। एक बार उन्होंने मजाक में कहा था - मेडिसिन मेरी लॉफुल वाइफ है और लिटरेचर मिस्ट्रेस।

चेखव ने परंपरागत कहानियों में आने वाले नैतिकतावादी आग्रहों को अस्वीकार कर दिया। उनका कहना था कि एक आर्टिस्ट का काम सवाल खड़े करना है, न कि उनका जवाब देना। चेखव के नाटक 'द सैगल', 'अंकल वान्या' और 'थ्री सिस्टर्स' विश्वप्रसिद्ध हैं। चेखव अपने नाटकों के मंचन में बहुत रुचि लेते थे और उनके रिहर्सल के दौरान खुद मौजूद रहते थे।

चेखव के समय में रूसी समाज भीषण उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा था। इस दौर में नया उभरता मध्यवर्ग नवीन आशाओं और आकांक्षाओं का वाहक था, पर उसके जीवन में भी विडम्बनाएं कम नहीं थीं। इसी मध्यवर्ग के जीवन की सच्चाइयों को सामने लाने का काम चेखव ने बहुत ही संवेदनशीलता के साथ किया।   

1879 में चेखव ने मॉस्को स्टेट मेडिकल यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। 1884 में उन्होंने मेडिकल परीक्षा पास कर ली और बतौर फिजिशियन काम शुरू किया। अगले ही साल चेखव बीमार पड़ गए। उन्हें लाइलाज बीमारी तपेदिक हो गई। लेकिन वे लगातार लिखते रहे। 1886 में उन्हें सेंट पीटर्सबर्ग के मशहूर अखबार 'नोवोया रेम्या' के लिए लिखने का आमंत्रण मिला। इसके अरबपति मालिक एलेक्सी सुवोरिन ने उन्हें उस समय के हिसाब से दोगुना पारिश्रमिक दिया। वे चेखव के आजीवन अभिन्न मित्र बने रहे। उसी दौरान रूस के बड़े साहित्यकारों के बीच उनकी पहचान बनी। 1887 में चेखव को प्रतिष्ठित पुश्किन प्राइज मिला। चेखव बहुत ज्यादा लिखते थे। कहा जाता है कि वे अपनी स्क्रिप्ट दोबारा नहीं पढ़ते थे।

चेखव अपने जीवनकाल में ही काफी प्रसिद्ध हो चुके थे। रूस के तमाम बड़े लेखकों के साथ उनके प्रगाढ़ संबंध थे। टॉल्सटाय और गोर्की जैसे लेखक उनका काफी सम्मान करते थे। बीमारी के बावजूद चेखव कठिन परिश्रम करते थे। वे लगातार लेखन और अपने नाटकों के मंचन के सिलसिले में व्यस्त रहते थे। उनकी बीमारी धीरे-धीरे बढ़ती ही जा रही थी। 15 जुलाई, 1904 को महज 44 साल की उम्र में इस महान लेखक का निधन हो गया।


जेम्स ज्वॉयस, वर्जिनिया वुल्फ, कैथरीन मैन्सफील्ड जैसे साहित्यकारों ने उनके लेखन के महत्त्व को रेखांकित किया। मशहूर नाटककार जॉर्ज बर्नाड शॉ ने उन्हें युग प्रवर्तक साहित्यकार बताया। अर्नेस्ट हेमिंग्वे ने उन्हें अद्वितीय नाटककार बताया। चेखव एक ऐसे मानवतावादी रचनाकार थे, जिन्होंने अपनी कृतियों में युगीन आकांक्षाओं को अभिव्यक्त किया। 

Wednesday, 3 June 2015

चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती

- त्रिलोचन शास्त्री



चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती
मैं जब पढ़ने लगता हूं वह आ जाती है
खड़ी खड़ी चुपचाप सुना करती है
उसे बड़ा अचरज होता है :
इन काले चिन्हों से कैसे ये सब स्वर
निकला करते हैं

चम्पा सुन्दर की लड़की है
सुन्दर ग्वाला है : गायें-भैंसे रखता है
चम्पा चौपायों के लेकर
चरवाही करने जाती है

चम्पा अच्छी है
चंचल है
नटखट भी है
कभी कभी ऊधम करती है
कभी कभी वह क़लम चुरा देती है
जैसे तैसे उसे ढूंढ कर जब लाता हूं
पाता हूं – अब क़ाग़ज गायब
परेशान फिर हो जाता हूं

चम्पा कहती है :
तुम कागद ही गोदा करते हो दिन भर
क्या यह काम बहुत अच्छा है
यह सुन कर मैं हंस देता हूं
फिर चम्पा चुप हो जाती है

उस दिन चम्पा आई, मैंने कहा कि
चम्पा, तुम भी पढ़ लो
हारे गाढ़े काम सरेगा
गांधी बाबा की इच्छा है –
सब जन पढ़ना-लिखना सीखें
चम्पा ने यह कहा कि
मैं तो नहीं पढ़ूंगी
तुम तो कहते थे गांधी बाबा अच्छे हैं
वे पढ़ने लिखने की कैसे बात कहेंगे
मैं तो नहीं पढ़ूंगी

मैंने कहा कि चम्पा, पढ़ लेना अच्छा है
ब्याह तुम्हारा होगा, तुम गौने जाओगी,
कुछ दिन बालम संग साथ रह चला जायगा जब कलकत्ता
बड़ी दूर है वह कलकत्ता
कैसे उसे संदेसा दोगी
कैसे उसके पत्र पढ़ोगी
चम्पा पढ़ लेना अच्छा है!

चम्पा बोली : तुम कितने झूठे हो, देखा,
हाय राम, तुम पढ़-लिख कर इतने झूठे हो
मैं तो ब्याह कभी न करूंगी
और कहीं जो ब्याह हो गया
तो मैं अपने बालम को संग साथ रखूंगी
कलकत्ता मैं कभी न जाने दूंगी
कलकत्ते पर बजर गिरे।


Wednesday, 27 May 2015

अरुणा शानबाग की मौत : क्या बदला 42 वर्षों में

-    वीणा भाटिया

कुछ ही दिनों पहले 62 साल की अरुणा रामचंद्र शानबाग की 42 वर्षों तक लगातार कोमा में रहने के बाद मृत्यु हो गई। ज़्यादातर लोग अरुणा शानबाग के बारे में नहीं जानते हैं। उनकी मौत के बाद मीडिया में आई ख़बरों के माध्यम से कुछ लोग उन्हें जानने लगे, पर जल्दी भूल भी जाएंगे। पर क्या अरुणा शानबाग को आसानी से भुलाया जा सकता है? और वो भी तब जब वो कोई असाधारण महिला नहीं थीं। पर अरुणा शानबाग के जीवन और उनकी मौत में कुछ तो असाधारणता है जिसने संवेदनशील लोगों, बुद्धिजीवियों और महिला अधिकार के लिए लड़ने वाले लोगों के दिलो-दिमाग में एक ज़ुम्बिश पैदा की है। एक हलचल-सी पैदा हुई है जो दिलों के सुकून पर भारी है। अरुणा की मौत ने एक बार फ़िर से उन सवालों को हमारे सामने जलते हुए अंगारों के रूप में सामने रख दिया है, जिनसे हम मुंह चुरा के बच नहीं सकते।

42 साल पहले मुंबई के केइएम अस्पताल में कार्यरत नर्स अरुणा के साथ अस्पताल के ही बेसमेंट में बर्बर बलात्कार हुआ था। वह उस समय 25 वर्ष की थीं और जल्दी ही उनकी शादी होने वाली थी। अरुणा के साथ बलात्कार अस्पताल के ही एक वार्ड ब्वॉय सोहन लाल ने किया था जो पहले से ही उन पर बुरी नज़र रखता था। बलात्कार किए जाने के पहले उसने अरुणा के गले में कुत्ते की चेन बांध दी थी, जिससे उनके मस्तिष्क में ऑक्सीजन का प्रवाह रुक गया और वह कोमा में चली गईं। सोहन लाल को गिरफ़्तार कर लिया गया, पर सबूतों के अभाव में उस पर बलात्कार का मुकदमा नहीं चल सका। कोमा में चली जाने के कारण अरुणा कोई बयान दे पाने में असमर्थ थीं। मेडिकल जांच में बलात्कार की पुष्टि नहीं हो सकी। पता नहीं, डॉक्टरों पर किस तरह का दबाव था। पर बाद में की गई मेडिकल जांच में अरुणा के साथ बलात्कार की पुष्टि हुई, पर अभियुक्त सोहन लाल पर सिर्फ़ हत्या के प्रयास और लूट का मामला दर्ज हुआ। उसने अरुणा की सोने की चेन और सगाई की अंगूठी छीन ली थी। सोहन लाल को महज़ सात साल की सजा हुई। और अरुणा शानबाग अगले 42 वर्षों तक जिंदा लाश बनी केइएम अस्पताल के वार्ड नंबर-4 में जीवन और मौत से अनभिज्ञ पड़ी रही। इन 42 वर्षों के दौरान केइएम अस्पताल की नर्सों ने अरुणा शानबाग की जो सेवा की, वह मेडिकल इतिहास में बेमिसाल है। उनकी मृत्यु के बाद वहां की नर्सों को एक अजीब-से खालीपन ने घेर लिया है। यद्यपि अरुणा शानबाग के कोमा में होने के कारण उनका अस्तित्व महज भौतिक रूप में ही था, पर इतना भी वहां की नर्सों को संबल प्रदान करता था और उनके अपने अस्तित्व को भी रेखांकित करता था। पर अब वहां एक खालीपन है। इसके साथ ही उनके अस्तित्व पर एक स्त्री होने की वजह से सवाल उसी रूप में है, जैसे 42 वर्ष पहले था। उनकी इज़्ज़त महफ़ूज नहीं है। उनकी सुरक्षा ख़तरे में है। पुरुष समाज में उनकी दोयम दर्जे की स्थिति बरक़रार है।

यह स्थिति निम्न वर्ग से लेकर तमाम वंचित वर्ग की स्त्रियों के साथ है। मध्य और उच्च वर्ग की महिलाओं के साथ बर्बर बलात्कार की वारदात कम ही होती हैं कुछ अपवादों के सिवा। यह अलग बात है कि यौन शोषण के मामले हर वर्ग और समुदाय की स्त्रियों के साथ कमोबेश होते ही हैं, पर निम्न और वंचित वर्ग की स्त्रियां बलात्कारियों की आसान शिकार होती हैं। स्त्रियों को अपना शिकार बनाने वाले भेड़िये तरह-तरह के रूप में घूमते नज़र आ जाते हैं। ये आवारागर्द तत्वों से लेकर दबंग अपराधी और अय्याश अमीरजादे तक होते हैं जिन्हें न कानून का भय होता है, न ही न्यायालय का, क्योंकि अपने अनुभवों और पूर्व उदाहरणों से ये भली-भांति समझ जाते हैं कि कानून उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता, अगर वे किसी भी तरह उसे अपने पक्ष में प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।

अरुणा शानबाग के मामले में कानून अपना काम कर पाने में असफल रहा। वह एक बर्बर अपराधी के पक्ष में झुक गया। ऐसा क्यों? इसलिए कि ऐसी लोमहर्षक घटना को किसी ने गंभीरता से नहीं लिया। न अस्पताल प्रशासन, न पुलिस और न ही न्यायालय ने इस मामले में संवेदनशीलता दिखाई। सबूत इकट्ठे नहीं किए गए। मेडिकल जांच में डॉक्टरों ने कोताही बरती, क्योंकि अरुणा एक सामान्य नर्स थी। दूर-दराज के किसी गांव से नौकरी करने मुंबई जैसे महानगर में आई थी। हज़ारों-लाखों ऐसी औरतें गांवों से पलायन कर रोज़ी-रोज़गार के लिए महानगरों में आती हैं। कौन उनकी इज़्ज़त की परवाह करता है! इतना ही नहीं, स्त्रियों की इज़्ज़त की जो गलत अवधारणा भारतीय मानस में गहराई से जड़ जमाये हुए है, वह भी बलात्कार की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए ज़िम्मेदार है। बलात्कार या यौन शोषण का मामला सामने आने पर परिवार के लोग उसे दबाना चाहते हैं। उनका मानना होता है कि मामला प्रकाश में आ जाने पर परिवार की बेइज़्ज़ती होगी। यही कारण है कि बलात्कार के अधिकांश मामलों में पुलिस में  रिपोर्ट होती ही नहीं। अरुणा शानबाग मामले में भी उसके होने वाले पति ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराए जाने का विरोध किया था। दूसरी तरफ, पुलिस में मामला दर्ज कराए जाने के बावजूद न्यायिक प्रक्रिया की विसंगतियों के कारण शायद ही पीड़िताओं को न्याय मिल पाता है।

अरुणा शानबाग का मामला बहुत ही पुराना है। इस मामले को लेकर ऐच्छिक मृत्यु को न्यायालय से वैधता मिली, ये अलग बात है कि अरुणा शानबाग की सेवा में लगी नर्सों ने इसे उन पर लागू किए जाने से इनकार कर दिया। बहरहाल, बलात्कार की शिकार स्त्री किस तरह एक जिंदा लाश बन जाती है, यह साफ दिखाई पड़ा अरुणा के 42 साल तक कोमा में रहने के दौरान, यद्यपि उनकी जैसी देख-रेख केइएम अस्पताल की नर्सों ने की, वह भी एक मिसाल ही है।

भारतीय समाज और संस्कृति में बलात्कार की जड़ें बहुत ही गहरी हैं। अभिजात वर्ग बलात्कार को अपना परमाधिकार समझता रहा है। सामंती समाज से लेकर आज के संक्रमणशील दौर में बलात्कार स्त्रियों पर अत्याचार का औज़ार बना हुआ है। बलात्कार की हर घटना के बाद जब इसका बड़े पैमाने पर विरोध होता है तो लगता है कि इस प्रवृत्ति पर कुछ लगाम लगेगी। लेकिन बलात्कार के मामलों पर कानून सख्त किए जाने की जितनी बात होती है, बलात्कार की घटनाएं और भी बढ़-चढ़ कर सामने आने लगती हैं, मानो बलात्कारी कानून और शासन व्यवस्था को खुलेआम चुनौती देना चाहते हों। 2012 में दिल्ली निर्भया गैंगरेप की घटना के बाद बलात्कार संबंधी कानूनों की पुनर्समीक्षा की गई और इस संबंध में नए सिरे से कानूनों को परिभाषित किया गया। लेकिन कानून के भय से बलात्कार की घटनाओं में कोई कमी नहीं आई, बल्कि ये घटनाएं बढ़ी ही हैं। आंकड़े इसके गवाह हैं।

इससे स्पष्ट होता है कि बलात्कार की समस्या कानून-व्यवस्था से जुड़ी समस्या नहीं है, बल्कि यह समाज व्यवस्था से जुड़ी समस्या है। अमीरी-गरीबी और शोषण-दमन पर आधारित इस व्यवस्था में बलात्कार को मिटा पाना संभव नहीं है। पुरुष वर्चस्व और हर स्तर पर स्त्री उत्पीड़न शोषणमूलक व्यवस्था का अपरिहार्य गुणधर्म है। यह व्यवस्था हज़ारों वर्षों से बदस्तूर कायम है। कानूनी उपायों और सुधारवादी प्रयासों से बलात्कार और स्त्री उत्पीड़न के विविध रूपों को समाप्त नहीं किया जा सकता है।

स्त्री की वास्तविक आजादी एक समतावादी समाज में ही संभव है। शोषण पर आधारित सामाजिक व्यवस्था में स्त्री का स्थान दोयम दर्जे का है और रहेगा, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। यह ऐतिहासिक तथ्य है। स्त्री उत्पीड़न के रूप पूरी दुनिया में कमोबेश एक ही हैं। इसलिए स्त्री मुक्ति का संघर्ष सामाजिक व्यवस्था के बदलाव के संघर्ष से अलहदा नहीं हो सकता।

Wednesday, 10 October 2012

सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना/न होना तड़प का,सब कुछ सहन कर जाना- पाश





मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता

कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
जुगनुओं की लौ में पढ़ना
मुट्ठियां भींचकर बस वक्‍़त निकाल लेना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता-

सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना

सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो
आपकी नज़र में रुकी होती है

सबसे ख़तरनाक वो आंख होती है
जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्‍बत से चूमना भूल जाती है
और जो एक घटिया दोहराव के क्रम में खो जाती है
सबसे ख़तरनाक वो गीत होता है
जो मरसिए की तरह पढ़ा जाता है
आतंकित लोगों के दरवाज़ों पर
गुंडों की तरह अकड़ता है
सबसे ख़तरनाक वो चांद होता है
जो हर हत्‍याकांड के बाद
वीरान हुए आंगन में चढ़ता है
लेकिन आपकी आंखों में
मिर्चों की तरह नहीं पड़ता


सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है
जिसमें आत्‍मा का सूरज डूब जाए
और जिसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके जिस्‍म के पूरब में चुभ जाए
मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती

- पाश

Monday, 17 September 2012

हम लड़ेंगे साथी, उदास मौसम के लिये, हम लड़ेंगे साथी, गुलाम इच्छाओं के लिये....पाश

हम लड़ेंगे साथी, उदास मौसम के लिये
हम लड़ेंगे साथी, गुलाम इच्छाओं के लिये.......
हम चुनेंगे साथी, जिंदगी के टुकड़े
हथौड़ा अब भी चलता है, उदास निहाई पर
हल अब भी चलता हैं चीखती धरती पर
यह काम हमारा नहीं बनता है, प्रश्न नाचता है
प्रश्न के कंधों पर चढ़कर
हम लड़ेंगे साथी.................
कत्ल हुए जज्बों की कसम खाकर
बुझी हुई नजरों की कसम खाकर
हाथों पर पड़े घट्टों की कसम खाकर
हम लड़ेंगे साथी..................................
हम लड़ेंगे तब तक
जब तक वीरू बकरिहा
बकरियों का मूत पीता है
खिले हुए सरसों के फूल को
जब तक बोने वाले खुद नहीं सूंघते
कि सूजी आंखों वाली
गांव की अध्यापिका का पति जब तक
युद्ध से लौट नहीं आता...........................
जब तक पुलिस के सिपाही
अपने भाईयों का गला घोटने को मजबूर हैं
कि दफतरों के बाबू
जब तक लिखते हैं लहू से अक्षर................
हम लड़ेंगे जब तक
दुनिया में लड़ने की जरुरत बाकी है
जब तक बंदूक न हुई, तब तक तलवार होगी
जब तलवार न हुई, लड़ने की लगन होगी
लड़ने का ढंग न हुआ, लड़ने की जरूरत होगी........................
और हम लड़ेंगे साथी
हम लड़ेंगे
कि लड़े बगैर कुछ नहीं मिलता
हम लड़ेंगे
कि अब तक लड़े क्यों नहीं
हम लड़ेंगे
अपनी सजा कबूलने के लिए
लड़ते हुए जो मर गए
उनकी याद जिंदा रखने के लिए
हम लड़ेंगे.....................................................

Avtar Singh Paash

Wednesday, 12 September 2012

लाज़िम है कि हम भी देखेंगे वो दिन कि जिसका वादा है -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

लाज़िम है कि हम भी देखेंगे

वो दिन कि जिसका वादा है

जो लोह-ए-अज़ल में लिखा है

जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गरां

रुई की तरह उड़ जाएँगे

हम महक़ूमों के पाँव तले

ये धरती धड़-धड़ धड़केगी

और अहल-ए-हक़म के सर ऊपर

जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी

जब अर्ज-ए-ख़ुदा के काबे से

सब बुत उठवाए जाएँगे

हम अहल-ए-सफ़ा, मरदूद-ए-हरम

मसनद पे बिठाए जाएँगे

सब ताज उछाले जाएँगे

सब तख़्त गिराए जाएँगे


बस नाम रहेगा अल्लाह का

जो ग़ायब भी है हाज़िर भी

जो मंज़र भी है नाज़िर भी

उट्ठेगा अन-अल-हक़ का नारा

जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

और राज़ करेगी खुल्क-ए-ख़ुदा

जो मैं भी हूँ और तुम भी हो